एक संन्यासी जिसने मुगल साम्राज्य की नींव हिला दी

इतिहास के पन्नों पर कुछ नाम ऐसे अंकित होते हैं जो समय की धूल में भी धुंधले नहीं पड़ते। वीर बंदा सिंह बहादुर, जिन्हें बंदा बैरागी के नाम से भी जाना जाता है, ऐसे ही एक व्यक्तित्व थे जिनका जीवन एक साधारण शिकारी से आरंभ होकर एक महान योद्धा और क्रांतिकारी के रूप में परिणत हुआ। उन्होंने सत्रहवीं शताब्दी के अंत और अठारहवीं शताब्दी के आरंभ में उस मुगल साम्राज्य की जड़ें हिला दीं जिसे उस समय एशिया की सबसे शक्तिशाली सत्ता माना जाता था। उनकी कहानी केवल युद्ध और विजय की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे महात्मा की कहानी है जिसने आत्मिक रूपांतरण के बाद अपने जीवन को एक महान उद्देश्य के लिए समर्पित कर दिया।
बंदा बैरागी का जन्म 27 अक्तूबर 1670 को जम्मू के रजौरी जिले के पास तहसील राजौरी के ग्राम तख्तपुर में हुआ था। उनके पिता का नाम रामदेव था जो एक साधारण किसान थे। जन्म के समय उनका नाम लक्ष्मण दास रखा गया था। बालपन से ही उनमें साहस और स्वाभिमान के बीज अंकुरित होते दिखे। बचपन में वे शिकार के बड़े शौकीन थे और घने जंगलों में घूमना उनका प्रिय काम था।
एक दिन की एक घटना ने उनके जीवन की दिशा को सदा के लिए बदल दिया। जब वे लगभग पंद्रह वर्ष के थे, तब उन्होंने एक गर्भवती हिरनी का शिकार किया। उस हिरनी ने मरते मरते अपने दो बच्चों को जन्म दिया और वे बच्चे भी उनकी आँखों के सामने दम तोड़ गए। यह दृश्य देखकर लक्ष्मण दास के मन में इतनी गहरी पीड़ा हुई कि उन्होंने उसी क्षण शिकार छोड़ने का संकल्प लिया। इस घटना ने उन्हें वैराग्य की ओर धकेल दिया।
इसके बाद वे घर छोड़कर साधु जीवन की ओर अग्रसर हो गए। उनका परिचय जानकी प्रसाद नामक एक वैष्णव साधु से हुआ और उन्होंने उनसे दीक्षा लेकर अपना नाम माधोदास रख लिया। वे उत्तर भारत के विभिन्न तीर्थ स्थलों पर घूमते रहे और अंततः नासिक के पास गोदावरी नदी के किनारे अपना आश्रम बनाकर साधना में लीन हो गए। वहाँ वे वैराग्य की साधना करते और योग विद्या में पारंगत होते गए। स्थानीय लोग उन्हें बैरागी कहकर पुकारने लगे।
कुछ मुलाकातें ऐसी होती हैं जो न केवल दो व्यक्तियों को बल्कि पूरे युग को बदल देती हैं। माधोदास और गुरु गोविंद सिंह की भेंट ऐसी ही एक ऐतिहासिक घटना थी। सन 1708 में गुरु गोविंद सिंह नांदेड़ की यात्रा पर थे। उन्होंने माधोदास के आश्रम का दौरा किया। कहते हैं जब गुरु गोविंद सिंह माधोदास के आश्रम में पहुँचे तब माधोदास ने अपनी शक्तियों से उन्हें परेशान करने का प्रयास किया, किंतु गुरु गोविंद सिंह की आध्यात्मिक शक्ति के सामने उनकी सारी साधना निष्प्रभावी हो गई। तब माधोदास ने उनके सामने नतमस्तक होकर पूछा कि वे कौन हैं, जिस पर गुरु ने उत्तर दिया कि वे वही हैं जिनका माधोदास स्वयं बंदा अर्थात दास हैं।
यह संवाद अत्यंत महत्वपूर्ण था। माधोदास ने गुरु गोविंद सिंह को अपना गुरु स्वीकार किया और गुरु गोविंद सिंह ने उन्हें पंजाब भेजा और पाँच तीर, एक निशानसाहिब, एक नगारा और एक हुकुमनामा देकर कहा कि वे पंजाब जाकर मुगल जुल्म के खिलाफ संघर्ष करें और गुरु तेग बहादुर तथा साहिबजादों की शहादत का बदला लें। गुरु गोविंद सिंह स्वयं शीघ्र ही उनके साथ आने का वचन दिया किंतु उनकी 7 अक्तूबर 1708 को नांदेड़ में ही हत्या कर दी गई।
बंदा बैरागी जब पंजाब पहुँचे तो उनके पास एक सुस्पष्ट उद्देश्य था। उन्होंने गुरु गोविंद सिंह के हुकुमनामे को लेकर सिख जगत में संदेश भेजा और देखते ही देखते हजारों सिख योद्धा उनके नेतृत्व में एकत्रित हो गए। यह वही समय था जब औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य में उत्तराधिकार के लिए संघर्ष चल रहा था और साम्राज्य कमजोर पड़ रहा था।
बंदा बैरागी ने सबसे पहले सोनीपत, कैथल और समाना पर आक्रमण किया। समाना का नाम सिखों के लिए विशेष महत्व रखता था, यह जल्लादों का गांव था, गुरु तेग बहादुर का सिर काटने वाला जल्लाद जलालुद्दीन समाना का ही था। नवंबर 1709 में बंदा बैरागी ने समाना पर आक्रमण करके उसे नेस्तनाबूद कर दिया। इस विजय से सिखों का मनोबल ऊँचा हुआ और बंदा का नाम दूर दूर तक फैल गया।
इसके बाद उन्होंने सढ़ौरा पर आक्रमण किया। सढ़ौरा में उस्मान खान नामक एक अत्याचारी मुगल अधिकारी ने सैय्यद बुद्धु शाह के परिवार को उत्पीड़ित किया था। सैय्यद बुद्धु शाह एक मुस्लिम फकीर थे जिन्होंने गुरु गोविंद सिंह की आनंदपुर की लड़ाई में सहायता की थी। बंदा ने सढ़ौरा को भी जीत लिया।
बंदा बैरागी के अभियान का सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पड़ाव था सरहिंद की विजय। सरहिंद वह स्थान था जहाँ मुगल सूबेदार वजीर खान ने गुरु गोविंद सिंह के दो छोटे पुत्रों साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह को जिंदा दीवार में चुनवा दिया था। इन दोनों बच्चों की आयु उस समय मात्र सात और नौ वर्ष थी। यह सिख इतिहास का सबसे दर्दनाक अध्याय था।
22 मई 1710 को चप्पड़ चिड़ी के मैदान में निर्णायक युद्ध हुआ। बंदा बैरागी की सेना में लगभग अस्सी हजार योद्धा थे जबकि वजीर खान की सेना भी अत्यंत शक्तिशाली थी। इस युद्ध में बंदा बैरागी की विजय हुई। वजीर खान मारा गया और सरहिंद पर सिखों का अधिकार हो गया। सरहिंद का पतन मुगल साम्राज्य के लिए एक अत्यंत गहरा आघात था। यह पहली बार था जब किसी ने पंजाब में मुगल सत्ता को इस प्रकार चुनौती दी थी।
सरहिंद की विजय के बाद बंदा बैरागी ने लोहगढ़ को अपनी राजधानी बनाया। उन्होंने एक स्वतंत्र प्रशासन की स्थापना की और गुरु नानक एवं गुरु गोविंद सिंह के नाम पर सिक्के जारी किए। इन सिक्कों पर फारसी में लिखा था कि यह राज्य नानक गोविंद के आशीर्वाद से प्राप्त हुआ है। यह एक महत्वपूर्ण घोषणा थी कि मुगल सत्ता के समांतर एक स्वतंत्र सिख राज्य अस्तित्व में आ गया है।
बंदा बैरागी केवल एक योद्धा नहीं थे, वे एक दूरदर्शी समाज सुधारक भी थे। उन्होंने अपने शासित क्षेत्रों में जमींदारी प्रथा को समाप्त किया और किसानों को उनकी जमीन का मालिक बनाया। यह भारतीय इतिहास में संभवतः पहला ऐसा भूमि सुधार था जो किसी शासक ने स्वेच्छा से किया हो। उन्होंने घोषणा की कि जो भूमि किसान जोतता है वह उसकी है।
बंदा बैरागी ने ऊँच नीच के भेद को समाप्त करने का प्रयास किया। उनकी सेना में सभी जातियों और वर्गों के लोग थे। उन्होंने हिंदू और मुसलमान दोनों के लिए समान न्याय का सिद्धांत अपनाया। उनके शासनकाल में सिख प्रशासन में योग्यता को जाति से ऊपर रखा गया।
बंदा बैरागी की बढ़ती शक्ति से मुगल दरबार अत्यंत चिंतित हो गया। मुगल बादशाह बहादुर शाह प्रथम ने स्वयं एक विशाल सेना के साथ पंजाब की ओर कूच किया। उन्होंने बंदा बैरागी के विरुद्ध जेहाद की घोषणा की और सभी मुस्लिम शासकों से सहायता माँगी। मुगल सेना ने लोहगढ़ को घेर लिया।
बंदा बैरागी अत्यंत चतुराई से मुगल घेरे को तोड़कर निकल गए और पहाड़ी इलाकों में चले गए। इसके बाद कई वर्षों तक मुगलों और सिखों के बीच छापामार युद्ध चलता रहा। बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु के बाद फर्रुखसियर मुगल बादशाह बना और उसने बंदा बैरागी को कुचलने के लिए अब्दुस समद खान को पंजाब का सूबेदार नियुक्त किया।
सन 1715 में बंदा बैरागी और उनके साथियों को गुरदासपुर के समीप गुरदास नांगल नामक स्थान पर घेर लिया गया। लगभग आठ महीने तक घेराबंदी चली। इस दौरान बंदा बैरागी और उनके साथियों ने अत्यंत दयनीय परिस्थितियों में संघर्ष किया। खाद्य सामग्री समाप्त हो गई, घास और पत्ते खाकर जीवित रहे, किंतु आत्मसमर्पण नहीं किया। अंततः दिसंबर 1715 में जब स्थिति असहनीय हो गई तब वे मुगलों के हाथ लग गए।
बंदा बैरागी और उनके सैकड़ों साथियों को बंदी बनाकर दिल्ली लाया गया। उनके साथ लगभग सात सौ से अधिक सिख बंदी थे। दिल्ली में उनका जो जुलूस निकाला गया वह मुगल दरबार की विजय का प्रदर्शन था। बंदा बैरागी को लोहे के पिंजरे में रखा गया और उनके सिर पर एक बाज की टोपी पहनाई गई।
फर्रुखसियर ने बंदा बैरागी के सामने एक प्रस्ताव रखा कि यदि वे इस्लाम कबूल कर लें तो उनकी जान बख्श दी जाएगी। बंदा बैरागी ने इस प्रस्ताव को दृढ़ता से अस्वीकार कर दिया। मुगल दरबारियों ने प्रत्येक दिन उनके साथियों को उनके सामने फाँसी देना आरंभ किया ताकि वे डरकर धर्म परिवर्तन के लिए तैयार हो जाएँ। प्रतिदिन सौ सौ सिखों को शहीद किया जाता था और बंदा बैरागी को यह दृश्य देखने के लिए बाध्य किया जाता था।
इस भयानक यंत्रणा के बावजूद बंदा बैरागी का मनोबल नहीं टूटा। उन्होंने अपने साथियों को शहीद होते देखा किंतु अपनी आस्था से विचलित नहीं हुए। समकालीन फारसी इतिहासकार मिर्जा मुहम्मद हरिसी ने लिखा है कि बंदा बैरागी के चेहरे पर किसी भी प्रकार के भय या दुख का भाव नहीं था। वे शांत और स्थिर बने रहे।
9 जून 1716 को बंदा बैरागी को दिल्ली के मेहरौली के पास खुले मैदान में लाया गया। पहले उनके छोटे पुत्र अजय सिंह को, जो मात्र चार वर्ष का था, उनकी गोद में बैठाकर उनके हाथों से मारने के लिए कहा गया। उन्होंने इसे अस्वीकार किया। तब मुगल सैनिकों ने उस बालक को मार डाला और उसका हृदय निकालकर बंदा बैरागी के मुँह में ठूँसा गया। इस अमानवीय यातना के बाद भी बंदा बैरागी का संकल्प नहीं डिगा।
इसके बाद उनके शरीर को गर्म चिमटों से नोचा गया, उनकी आँखें निकाली गईं, हाथ पैर काटे गए और अंततः उनका सिर धड़ से अलग कर दिया गया। वे बंदा बैरागी जिनका जन्म एक साधारण किसान के घर हुआ था, जो एक समय वैष्णव संन्यासी थे, उन्होंने मुगल साम्राज्य के सामने झुकने से इनकार करते हुए प्राण त्याग दिए।
वीर बंदा बैरागी का ऐतिहासिक महत्व केवल उनकी सैनिक विजयों तक सीमित नहीं है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि मुगल साम्राज्य अजेय नहीं है। उनकी मृत्यु के बाद सिखों ने हार नहीं मानी बल्कि उनकी शहादत ने सिख जाति में एक नई ऊर्जा का संचार किया। अठारहवीं शताब्दी में सिख मिसलों का उदय हुआ और 1799 में महाराजा रणजीत सिंह ने पंजाब में एक शक्तिशाली सिख साम्राज्य की स्थापना की। बंदा बैरागी का संघर्ष इस पूरी प्रक्रिया की नींव था।
फ्रांसीसी यात्री और इतिहासकार एन्थोनी मोनसेरेट ने लिखा है कि बंदा बैरागी की विजयों ने पंजाब के राजनीतिक मानचित्र को हमेशा के लिए बदल दिया। डॉ. गंडा सिंह जो सिख इतिहास के प्रमुख विद्वान हैं, अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि बंदा सिंह बहादुर का जीवन एक ऐसी प्रेरणा है जो पीढ़ी दर पीढ़ी सिख समाज को शक्ति देती रही है।

