futuredसाहित्य

मैं नीर भरी दुख की बदली

रेखा पाण्डेय (लिपि)

आधुनिक हिंदी साहित्य के आकाश में महादेवी वर्मा एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र के समान हैं जिनकी आभा करुणा और वेदना के रंगों से निर्मित है। छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक होने के नाते उन्होंने कविता को जो सूक्ष्मता और दार्शनिक गहराई प्रदान की वह अद्वितीय है। उनकी सुप्रसिद्ध पंक्ति मैं नीर भरी दुख की बदली केवल एक काव्य रचना का अंश मात्र नहीं है बल्कि यह उनके संपूर्ण जीवन दर्शन और आत्मगत अनुभूतियों का निचोड़ है। हम महादेवी जी के इस अमर गीत के मर्म को समझने का प्रयास करेंगे और देखेंगे कि कैसे एक स्त्री की व्यक्तिगत वेदना वैश्विक करुणा में रूपांतरित होकर अमर हो जाती है।

महादेवी वर्मा का जन्म बीसवीं शताब्दी के आरंभिक काल में हुआ था और उनका लालन पालन एक ऐसे वातावरण में हुआ जहाँ शिक्षा और संस्कारों का संगम था। किंतु उनके अंतर्मन में जो विरहिणी की चेतना जाग्रत हुई उसका मूल उनके एकांत प्रिय स्वभाव और आध्यात्मिक झुकाव में निहित था। सांध्यगीत काव्य संग्रह से उद्धृत यह गीत मैं नीर भरी दुख की बदली उनके व्यक्तित्व का सबसे सटीक प्रतिबिंब माना जाता है। यहाँ बदली या मेघ का प्रतीक अत्यंत गहन है। जिस प्रकार एक बदली आकाश में उमड़ती है घुमड़ती है और अंततः अपनी बूंदों से पृथ्वी की प्यास बुझाकर स्वयं को विसर्जित कर देती है उसी प्रकार महादेवी जी अपना संपूर्ण अस्तित्व उस अज्ञात प्रियतम की स्मृति और मानवता की सेवा में समर्पित कर देती हैं।

इस गीत की पहली पंक्ति में ही महादेवी जी स्वयं को नीर भरी दुख की बदली घोषित करती हैं। यहाँ दुख शब्द को भौतिक अभावों या सांसारिक कष्टों के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए। छायावादी काव्य में दुख एक साधना है एक उपलब्धि है। यह वह विरह है जो भक्त को भगवान से या आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है। महादेवी जी का दुख एकांतिक होते हुए भी सर्वव्यापी है। वे कहती हैं कि उनके स्पंदन में चिर निस्पंद बसा है। इसका अर्थ है कि उनके जीवन की गतिशीलता के पीछे वह परम स्थिरता या परमात्मा विद्यमान है जिसकी खोज में वे निरंतर रत हैं। उनके क्रंदन में आहत विश्व हंसता है। यह एक अत्यंत मानवीय और उच्च कोटि का विचार है। जब एक कलाकार या कवि रोता है तो उसकी पीड़ा से जो सृजन होता है वह संसार को सुख और सौंदर्य प्रदान करता है। महादेवी जी की आंखों से निकलने वाले आंसू शब्द बनकर काव्य के रूप में ढलते हैं जिसे पढ़कर पाठक का हृदय आनंदित होता है।

यह भी पढ़ें  क्या जैव विविधता का नाश मानव स्वास्थ्य के लिए बन रहा है सबसे बड़ा खतरा ?

गीत के अगले चरणों में वे प्रकृति के साथ अपने तादात्म्य को और अधिक स्पष्ट करती हैं। वे कहती हैं कि नयन में दीपक से जलते और पलकों में निर्झरिणी मछली। यहाँ दीपक और निर्झरिणी के बिंब परस्पर विरोधी लगते हुए भी एक अद्भुत सामंजस्य पैदा करते हैं। दीपक जलने और तपस्या का प्रतीक है तो निर्झरिणी अर्थात नदी बहाव और गतिशीलता का। महादेवी जी की आंखें उस अज्ञात की प्रतीक्षा में दीपक की तरह जल रही हैं और साथ ही विरह के आंसू नदी बनकर बह रहे हैं। यह स्थिति उस विरहिणी की है जो जलते हुए भी शीतलता प्रदान करने की क्षमता रखती है। वे स्वयं को आकाश के किसी एक कोने तक सीमित नहीं मानतीं बल्कि उनका परिचय यह है कि वे कल आई थीं और आज चली जा रही हैं। यह जीवन की नश्वरता का बोध है जो उन्हें संसार की मोह माया से विरक्त करता है।

महादेवी वर्मा के इस गद्य और पद्य में जो मानवीयता है वह उनके वास्तविक जीवन में भी दिखाई देती थी। प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्राचार्य रहते हुए उन्होंने न जाने कितनी बालिकाओं के भविष्य को संवारा। उनका दुख केवल शब्दों तक सीमित नहीं था। वे उन लोगों के प्रति गहरी सहानुभूति रखती थीं जो समाज के हाशिए पर थे। उनके रेखाचित्रों और संस्मरणों में जिस प्रकार गिल्लू गौरा या रामा जैसे पात्रों का वर्णन मिलता है वह सिद्ध करता है कि उनकी करुणा केवल मनुष्य तक सीमित नहीं थी बल्कि वह समस्त चराचर जगत को अपने आलिंगन में लेती थी। मैं नीर भरी दुख की बदली की वह बदली भी सबको भिगोती है किसी के साथ भेदभाव नहीं करती। वह ऊसर पर भी बरसती है और उपजाऊ भूमि पर भी।

साहित्यिक दृष्टि से देखें तो इस गीत में प्रयुक्त रूपक अलंकार ने इसे अमर बना दिया है। बदली का प्रतीकार्थ मानवीय जीवन की क्षणभंगुरता को भी दर्शाता है। आकाश में बदली का कोई स्थायी घर नहीं होता। वह तो बस हवा के झोंकों के साथ बहती रहती है। महादेवी जी भी कहती हैं कि विस्तृत नभ का कोई कोना मेरा न कभी अपना होना। यह वैराग्य की वह पराकाष्ठा है जहाँ मनुष्य सब कुछ पाकर भी स्वयं को अकिंचन महसूस करता है। वे इस संसार में आईं अपना संदेश दिया और बिना किसी अधिकार बोध के यहाँ से विदा होने की बात करती हैं। उनका पद चिन्ह कहीं भी अंकित नहीं रहता क्योंकि वे धूल को मलीन नहीं करतीं और न ही आने जाने से कोई शोर मचाती हैं। यह शालीनता और गरिमा महादेवी जी के व्यक्तित्व की पहचान है।

यह भी पढ़ें  वेदों और पुराणों में प्रकृति संरक्षण की अवधारणा : जैव विविधता दिवस विशेष

अक्सर आलोचक महादेवी जी को वेदना की कवयित्री कहकर एक सीमित दायरे में बांधने का प्रयास करते हैं किंतु उनके दुख में एक प्रकार का गर्व है। वे दुख को कमज़ोरी नहीं मानतीं बल्कि उसे अपनी शक्ति बनाती हैं। वे कहती हैं कि जिस प्रकार धूल को पानी की बूंदें मिलकर कीचड़ नहीं बनातीं बल्कि उसे नया जीवन देती हैं वैसे ही उनकी वेदना समाज को नया स्वरूप प्रदान करती है। उनका गद्य शैली का यह पक्ष उनके चिंतन की गहराई को उजागर करता है। वे मानती हैं कि मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म दूसरे के दुख को समझना और उसे बांटना है। उनकी बदली प्यासी धरती को तृप्त करने के लिए स्वयं मिट जाती है। यही भारतीय संस्कृति का परोपकारी संदेश भी है।

आज के इस भौतिकवादी युग में जहाँ हर व्यक्ति संचय की दौड़ में लगा है और अपनी पहचान बनाने के लिए शोर मचा रहा है महादेवी जी की ये पंक्तियां एक ठंडी बयार की तरह आती हैं। वे हमें सिखाती हैं कि शांत रहकर भी बड़ा कार्य किया जा सकता है। परिचय इतना इतिहास यही उमड़ी कल थी मिट आज चली। यह पंक्ति हमें अहंकार से मुक्त करती है। हम सब इस ब्रह्मांड रूपी विशाल आकाश में छोटी छोटी बदलियों के समान ही तो हैं जिनका अस्तित्व थोड़े समय के लिए है। फिर क्यों न हम इस थोड़े से समय में प्रेम और करुणा की वर्षा करें ताकि हमारे जाने के बाद यह संसार थोड़ा और सुंदर बन सके।

यह भी पढ़ें  सनातन संस्कृति और पुराणों में कछुओं का महत्व

महादेवी जी ने अपने जीवन में बुद्ध के दर्शन को आत्मसात किया था। बुद्ध का दुखवाद उनके काव्य में करुणा बनकर उभरा है। महादेवी जी की बदली का दुख भी लोक कल्याणकारी है। वह रोती है तो बिजली चमकती है अर्थात क्रांति का संचार होता है। वह गिरती है तो नव जीवन का अंकुर फूटता है। इस प्रकार उनका गीत व्यक्तिगत पीड़ा से आरंभ होकर समष्टिगत चेतना पर समाप्त होता है। उन्होंने छायावाद को जो वैचारिकता दी वह मीरा के बाद हिंदी साहित्य में दूसरी बार देखने को मिली। यदि मीरा ने कृष्ण के लिए आंसू बहाए तो महादेवी ने उस निराकार अलौकिक तत्व के लिए अपनी आंखों को दीपक बनाया।

अंततः महादेवी वर्मा का यह अमर आख्यान हमें स्वयं के भीतर झांकने की प्रेरणा देता है। मैं नीर भरी दुख की बदली केवल एक कविता नहीं बल्कि एक साधना पथ है। यह हमें सिखाता है कि आंसू केवल निर्बलता के प्रतीक नहीं होते बल्कि वे हृदय की पवित्रता के परिचायक भी होते हैं। महादेवी जी ने अपनी लेखनी से जिस करुणा के महल का निर्माण किया उसकी नींव उनके स्वयं के अनुभव थे। उन्होंने स्त्री अस्मिता और उसकी भावनात्मक गहनता को जो ऊंचाइयां दीं वे कालजयी हैं।

आज भी जब कोई व्यक्ति अपने एकांत में हार महसूस करता है या विरह की अग्नि में जलता है तो उसे महादेवी की इन पंक्तियों में सहारा मिलता है। वह बदली आज भी हिंदी साहित्य के अंबर पर छाई हुई है और अपनी शीतल बूंदों से पाठकों के मन को भिगो रही है। उनकी मानवीय गद्य शैली और काव्य का यह अनूठा संगम हमेशा हमें याद दिलाता रहेगा कि मनुष्य की सार्थकता लेने में नहीं बल्कि स्वयं को सर्वस्व दान कर देने में है। महादेवी जी की यह बदली कभी नहीं मिटेगी क्योंकि इसकी जड़ों में सत्यम शिवम और सुंदरम का शाश्वत निवास है। उनके शब्दों की गूंज और उनकी संवेदना की गहराई आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक स्तंभ बनी रहेगी जो उन्हें प्रेम करुणा और त्याग के वास्तविक अर्थ समझाती रहेगी।

अम्बिकापुर निवासी लेखिका वरिष्ठ साहित्यकार एवं हिन्दी व्याख्याता हैं।