आर डी प्रजापति : दुनिया को करीब से जानने के लिए घुमक्कड़ी जरुरी है।

घुमक्कड़ जंक्शन पर आज आपसे मुलाकात करवा रहे हैं जमशेदपुर निवासी आर डी प्रजापति से। आप टाटा स्टील के उत्पादन विभाग में कार्यरत हैं तथा नौकरी से समय मिलने पर घुमक्कड़ी सिद्ध करते हैं, आईए करते हैं इनसे घुमक्कड़ी चर्चा………

1 – आप अपनी शिक्षा दीक्षा, अपने बचपन का शहर एवं बचपन के जीवन के विषय में पाठकों को बताएं कि वह समय कैसा था?
@ राँची से पचास किमी दूर अपने पैतृक गाँव राहे से दसवीं तक की पढाई पूरी की। झारखण्ड का एक पठारी हिस्सा होने के कारण आस-पास नदी, पहाड़, जंगल आदि सब कुछ थे। बचपन से ही नदी-तालाबों में खेलते-खेलते स्वतः ही प्रकृति के साथ गहरा लगाव हो गया, मौका मिलते ही मोहल्ले के दो-चार साथियों के साथ पास के किसी पहाड़ी पर घूम आना, पेड़ों पर चढ़ अमरुद तोडना, पत्थर फेंककर आम-जामुन गिराना, ये सब उस समय बिल्कुल आम बात थी और यही मेरा पसंदीदा खेल भी था, कारण क्रिकेट-फुटबॉल जैसे खेलों में मुझे जरा भी रुचि नहीं रही। आगे की पढाई हेतु संत जेवियर्स कॉलेज, राँची में दाखिला लिया। गाँव से राँची की खचाखच भीड़ वाली बसों का सफर याद आते ही अभी भी रोमांच आ जाता है। राँची में कुछ सहपाठियों के साथ हम एक कमरे में रहते थे। पहली बार शहरी जीवन अनुभव किया, अक्सर कॉलेज पीरियड की समाप्ति के बाद शाम के वक़्त रोजाना पैदल निरुद्देश्य अकेले ही दूर-दूर निकल पड़ता था, हर सड़क को देखने की जिज्ञासा होती, इस प्रकार राँची के करीब हर गली-चौराहे को कदमों से ही नाप लिया। लेकिन इंटर साइंस के बाद ही टाटा स्टील में ट्रेड अप्रेंटिस के लिए चुन लिया गया और फिर से जमशेदपुर आ गया, इस तरह बचपन एवं किशोरावस्था राँची-जमशेदपुर के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा। परिस्थितियां ही कुछ ऐसी थीं की कम उम्र में नौकरी से जुड़ने के कारण बाकि शिक्षा मुझे डिस्टेंस या पार्ट टाइम में करनी पड़ी।

2 – वर्तमान में आप क्या करते हैं एवं परिवार में कौन-कौन हैं ?
@ वर्तमान में टाटा स्टील का एक कर्मचारी हूँ और जमशेदपुर में उत्पादन विभाग में कार्यरत हूँ। परिवार में माता-पिता, पत्नी और एक छोटा भाई है, हाल ही में एक पुत्र की प्राप्ति भी हुई है।

3 – घूमने की रुचि आपके भीतर कहाँ से जागृत हुई?
@ बचपन से जिन चीजों के बारे इतिहास-भूगोल की किताबों में पढ़ता था, उन्हें साक्षात् देख पाने की व्याकुलता ने ही घूमने में रुचि जगा दिया। कभी कोई दिल्ली-मुम्बई जैसे शहरों से भी घूम आता तो मुझे भी जाने की तीव्र इच्छा होती, दूसरों की बातें सुनकर। कुल मिलाकर जिज्ञासा ने ही घूमने में रूचि जगाई।

4 – किस तरह की घुमक्कड़ी आप पसंद करते हैं, ट्रेकिंग एवं रोमांचक खेलों भी क्या सम्मिलित हैं, कठिनाइयाँ भी बताएँ ?@ मैं मुख्यतः प्राकृतिक और भौगोलिक नज़ारों का शौकीन हूँ, लेकिन साथ ही एतिहासिक स्थलों और बड़े शहरों का भ्रमण भी मेरी रुचियों में शामिल है। निजी वाहन के बजाय सार्वजनिक परिवहन अधिक पसंद है। रोमांचक खेलों में तो अब तक कुछ खास नहीं, बस एक-दो बार रिवर-राफ्टिंग किया है। बाइकिंग भी बहुत भाता है, पहले दो-तीन सौ किलोमीटर तक की ही यात्रा बाइक से की थी, परन्तु पिछले वर्ष लद्दाख में ढाई-तीन हजार किमी लम्बी बाइक यात्रा काफी रोमांचक रही। पहली बार पहाड़ों में बाइक चलायी, दलदल और पथरीले नालों को मुश्किल से पार किया, यह अब तक की घुमक्क्ड़ी का सबसे खास अनुभव रहा।

5. उस यात्रा के बारे में बताएं जहाँ आप पहली बार घूमने गए और क्या अनुभव रहा?

@ मेरी सबसे पहली घुमक्कड़ी उत्तराखंड में एक ट्रैकिंग ही थी जो अपनी कंपनी द्वारा ही प्रायोजित थी, सन 2009 में हम टाटानगर से हरिद्वार गए, फिर उत्तरकाशी के पास संगम चट्टी से सूर्याटॉप की चढ़ाई शुरू की। सबसे बड़ी बात यह थी कि हमारी टीम एवरेस्ट पर चढ़ने वाली प्रथम भारतीय महिला सुश्री बछेन्द्री पाल के अपरोक्ष नेतृत्व में थी, क्योंकि वे यहाँ के एडवेंचर विभाग की प्रमुख हैं। वहां उन्होंने हमसे अपने बहुत सारे पुराने अनुभव बताये, प्रथम एवेरेस्ट चढ़ाई के रोमांचक अनुभव को बेस कैंप में हमने बड़े चाव से सुना। हालाँकि यह ट्रैक नौसिखियों के लिए ही थी, लेकिन मेरे लिए हिमालय से पहली मुलाकात यही थी। जिस हिमालय के बारे बचपन से पढ़ते आ रहे थे, उससे रूबरू होना किसी सपने के सच होने जैसा ही था। जिस जून के महीने में मैदानों में हम झुलसते थे, वहाँ कंबल ओढ़ रहे थे, वैसे बर्फ देखने की तमन्ना उस वक़्त पूरी नहीं हो पाई थी परंतु रंग-बिरंगे फूलों से भरे हुए घाटी खूब नजर आए। पंद्रह दिनों की यह यात्रा तो काफी थकान भरी रही, लेकिन पहाड़ों की दुनिया में जीवन का यह पहला और अविस्मरणीय अनुभव था।

6 – घुमक्कड़ी के दौरान आप परिवार एवं अपने शौक के बीच किस तरह सामंजस्य बिठाते हैं?

@ घुमक्क्ड़ी अगर परिवार के साथ करनी हो, तो कोई खास सामंजस्य नहीं बिठानी पड़ती, सिर्फ नौकरी से छुट्टी लिया और निकल पड़े ! परन्तु परिवार छोड़ अकेले या दोस्तों के साथ जाने पर घर की चिंता तो लगी ही रहती है। आरामदायक यात्राओं में परिवार के साथ और कठिन यात्राओं में अकेले या दोस्तों के साथ- बस यही फार्मूला अब मैंने अपना लिया है। कभी उत्साह में कमी पड़े तो राहुल सांकृत्यायन की “घुमक्क्ड शास्त्र” बार-बार पढ़ लेता हूँ।

7 – आपकी अन्य रुचियों के विषय में बताइए।

@ घुमक्कड़ी के अलावा मुझे गाने सुनने और इंटरनेट सर्फ करने का बहुत शौक है। सिनेमा तो आजकल बहुत कम ही देखता हूँ। इनके अलावा यात्रा पुस्तकें पढ़ता हूँ और एक यात्रा ब्लॉग भी आजकल लिख रहा हूँ।

8 – घुमक्कड़ी (देशाटन, तीर्थाटन, पर्यटन) को जीवन के लिए आवश्यक क्यों माना जाता है?

@ हर किसी के लिए घूमने के अपने-अपने मायने हैं, कोई रोजमर्रा की नीरसता हटाने के लिए घूमता है, तो कोई मौज मस्ती के लिए। भारत में अधिकांश लोग तीर्थ यात्रा करते पाए जाते हैं। मेरी राय में घुमक्क्ड़ी से बड़ा ज्ञान प्राप्ति का कोई साधन नहीं है और दुनिया को करीब से जानने के लिए जरुरी है। बड़े-बड़े महापुरुषों के जीवन में भी घुमक्क्ड़ी एक अनिवार्य पहलू था। घुमक्क्ड़ी के बिना हम देश-दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के रहन-सहन, संस्कृति, भूगोल आदि के बारे सिर्फ पढ़ या सुन ही सकते हैं, उन्हें महसूस नहीं कर सकते।

9 – आपकी सबसे रोमांचक यात्रा कौन सी थी, अभी तक कहाँ कहाँ की यात्राएँ की और उन यात्राओं से क्या सीखने मिला?

@ अब तक की सबसे रोमांचक यात्रा लद्दाख की बाइक यात्रा एवं अंडमान यात्रा रही। लद्दाख यात्रा ने पहली बार ऊँचे पहाड़ों और दर्रों में विषम परिस्थितियों में बाइक चलाने का अनुभव दिया, जबकि अंडमान यात्रा ने समुद्र की एक अलग ही दुनिया से परिचित करवाया। दोनों यात्राओं से यह पता चला की सभी पहाड़ और समुद्री तट एक जैसे नहीं हुआ करते। देश के इन सुदूर हिस्सों में जिंदगी कैसी होती है, यह मैंने इन दोनों यात्राओं से जाना।
इसके अलावा मनाली, हरिद्वार, उत्तरकाशी, गोवा, मुंबई, पूरी, दिल्ली, आगरा, बोध गया, पटना, दार्जिलिंग, गंगटोक, कोलकाता, शिलांग, चेरापूंजी, गुवाहाटी, बनारस, ऊटी, केरल, कन्याकुमारी, बैंगलोर और नेपाल का भ्रमण कर चुका हूँ। और हाँ, अपने राज्य झारखण्ड के भी करीब सभी दर्शनीय स्थान देख ही लिया है। इन यात्राओं ने भारत की हिमालय से लेकर समुद्र तक और महानगरों से लेकर गाँवों तक की विविधता के दर्शन करवा दिए, परन्तु अभी भी बहुत कुछ बाकी ही है।

10 – घुमक्कड़ों के लिए आपका क्या संदेश हैं?

@ घुमक्कड़ी नहीं किया तो कुछ नहीं किया। दुनिया बहुत बड़ी है, एक ही स्थान पर पड़े मत रहिये, खुद को गतिशील बनाईये, आखिर ज़िन्दगी ना मिलेगी दुबारा।

Short URL: http://newsexpres.com/?p=1782

Posted by on Sep 16 2017. Filed under futured, घुमक्कड़ जंक्शन. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

16 Comments for “आर डी प्रजापति : दुनिया को करीब से जानने के लिए घुमक्कड़ी जरुरी है।”

  1. आर डी भाई, आपके जीवन के कई अनछुए पहलुओं से रु ब रु हुए । आप और महेंद्र सिंह धोनी एक ही कॉलेज के पढ़े हुए है । वैसे आपके ब्लॉग पर कई यात्राएं पढ़ चुके हैं । आभार ललित जी

    • मुकेश जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद और ललित जी का विशेष रूप से आभार जिनके सौजन्य से एक दूसरे से और भी अधिक रु-ब-रु होने का मौका हमें मिल रहा है .

  2. आर डी भाई, कुछ परिचय तो आपसे पहले से था ही और जो बाकी था आज आपाके इस साक्षात्कार ने पूरा कर दिया, बहुत कुछ जानने को मिला आपके बारे में, ऐसे ही घुमक्कड़ी करते रहिए और अपना अनुभव बांटते रहिए। सही कहा आपने कि हर किसी के लिए घुमक्कड़ी के अलग मायने होता है, कोई तीर्थ यात्रा करता है, कोई हिल स्टेशन जाता है, कोई प्राकृतिक दृश्यों से प्यार करता है तो कोई पहाड़ से और कोई समुद्र से, सबकी रुचियां अलग होती है, आपको शुभकामनाएं और ललित शर्मा सर जी को आभार

  3. Vinod gupta

    क्या बात है बाबा जय हो

  4. वाह…आरडी भाई मजा आ गया आपके बारे मे पढ कर।

  5. Rachana More

    प्रजापतिजी बहुत कुछ जान पाए आपके बारे में इस साक्षात्कार को पढने के पश्चात। शुभकामनाएँ। 💐

  6. Shashikant singh

    Well and good R.D. , good going, keep it up bro.

  7. Arun kr singh

    R D jee बहुत अच्छा लगा घुमक्कडी के बारे में आपके विचार जान कर और मुझे भी आपके साथ जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है वो समय भी काफी यादगार रहा है..इच्छा तो मेरी भी रहती है घुमाने की पर पारिवारिक बंदिशों के कारण जा नहीं पाता हूँ..
    पर आशा करता हूँ की आपके अनुभवों से प्रेरित होकर कम से कम भारत भ्रमण करूँगा….

    • बहुत बहुत धन्यवाद् अरुण जी, पहली उड़ान का मौका देने वाली गोवा की उस यात्रा की यादें तो अभी भी ताज़ा हैं, जिसे हमने साथ में किया था .

  8. Beautiful account of a curious traveler.

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