अभ्यानंद सिन्हा : घूमना पागलपन है तो मैं पागल हूँ।

घुमक्कड़ जंक्शन की इस कड़ी में आपसे मिलवा रहे हैं दिल्ली निवासी अभ्यानन्द सिन्हा से, ये उन घुमक्कड़ों में से हैं जो थोड़ा  भी अवकाश मिला तो घुमक्कड़ी कर लेते हैं। जो प्राइवेट नौकरी में रहते हुए कार्यालय और पारिवारिक व्यस्तताओं के बीच थोड़ा समय निकाल कर घूमने निकल पड़ते हैं। आइए उनसे घुमक्कड़ी चर्चा करते हैं……

1. आप अपनी शिक्षा दीक्षा, अपने बचपन का शहर एवं बचपन के जीवन के विषय में पाठकों को बताएं कि वह समय कैसा था?
@ बिहार के नालंदा जिले में एक छोटा सा गांव है परोहा, वही मेरी जन्मभूमि है और वहीं के एक मध्यवर्गीय परिवार से आता हूं। उस समय गांव में स्कूल नहीं था इसीलिए मैट्रिक तक की पढ़ाई अपने बुआ के यहां रहकर की। उसके बाद नवादा आ गया जहां से इंटरमीडियट किया और इसके आगे की पढ़ाई गया काॅलेज (गया) में पूरी की। इसके आगे भी पढ़ना चाहता था और बहुत कुछ करना भी चाहता था पर कुछ हालातों ने कदमों को रोक दिया, फिर रोजगार की तलाश में दिल्ली आ गया। बचपन में सीखने और ऐतिहासिक धरोहर को जानने की ललक आज भी है, उसी को अपनी घुमक्कड़ी से पूरा कर रहा हूं।

2. वर्तमान में आप क्या करते हैं एवं परिवार में कौन-कौन हैं ?
@करीब दो दशक से दिल्ली में ही हूं, मेरी जीवन साथी कंचन और बेटा आदित्या, बस छोटा सा परिवार है। एक पब्लिकेशन हाउस में वरिष्ठ डिजायनर के पद पर कार्यरत हूं। बेटा अभी नौवीं कक्षा में पढ़ता है लेकिन वो मुझे हमेशा ही ब्लाॅग में नई नई चीजें डालने के लिए प्रेरित करता रहता है। हमारे माता-पिता जी गांव में ही रहते हैं, उनके साथ हमारे दो छोटे भाई भी रहते हैं जिनकी शादी हो चुकी हैं।

3. घूमने की रुचि आपके भीतर कहां से जागृत हुई?
@घूमने का शौक तो बचपन से ही था लेकिन पहले पढ़ाई में उलझा रहा और फिर परिवार की जिम्मेदारियों ने मेरे कदमों को रोके रखा। एक बार बचपन में इसी घूमने के चक्कर में एक दिन अपने घर से निकल लिया। करीब दो सप्ताह तक गया, देवघर, कोलकाता और वाराणसी आदि जगहों पर विचरण करता रहा। शायद उस समय ये हमारी घुम्मकड़ी की बानगी भर थी। अब ये मत पूछ दीजियेगा कि इतने दिन घूमने के लिए पैसे कहां से आये। भाई पैसे की जरूरत केवल खाने के लिए थी पर भूख सहने की क्षमता मुझमें बचपन से रही है, तीन-चार दिन तक तो भूखे रह ही सकता हूं। रह गई बात आने जाने की, तो बिना पैसे के यात्राा करने के लिए अपना भारतीय रेल तो था ही। इधर मैं घूमने में मस्त था उधर घर वाले मुझे खोजने में पस्त थे। जब जेब खर्च के पैसे खत्म हो गए तो सीधा ताऊ (बड़े पापा) जी के पास पटना पहुंच गया, पता चला कि घर में सब बहुत परेशान हैं, मेरी मां का रो-रो कर बुरा हाल हो गया था। ताऊ जी ने तुरंत घर फोन करके मेरी सलामती की खबर दी। लेकिन मुझे घूमने का नशा तो लग ही चुका था। अब जब कुछ जिम्मेदारियों से राहत मिली है तो फिर शुरू कर दी है घुमक्कड़ी। अपने ब्लाॅग राही चलता जा के माध्यम से हजारों लोगों से जुड़ रहा हूं। आज अगर कुछ है तो बस खुला आसमान, बस पंछी बनकर हम निकल पड़ते हैं।

4. किस तरह की घुमक्कड़ी आप पसंद करते हैं, ट्रेकिंग एवं रोमांचक खेलों भी क्या सम्मिलित हैं, कठिनाइयां भी बताएं ?@ वैसे तो मुझे धार्मिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थानों को देखना पसंद है, और इनमें भी उन जगहों पर जाना ज्यादा पसंद करता हूँ जहां के बारे में बहुत कम लोग जानते हों। ट्रेकिंग का शौक भी है पर अभी कोई खास मौका मिला नहीं ट्रेकिंग पर जाने का, ले-देकर बस एक केदारनाथ की ट्रेकिंग किया है। वैसे सच कहूं तो किसी भी खेल में हमारी कभी कोई रूचि नहीं रही, पर साइकिलिंग थोड़ा बहुत किया है।

5. उस यात्राा के बारे में बताएं जहां आप पहली बार घूमने गए और क्या अनुभव रहा?

@वैसे पहली बार की घुमक्क्ड़ी का जवाब देना तो कठिन है। फिर भी वैष्णो देवी के दर्शन को ही मैं अपनी पहली घुमक्क्ड़ी मानता हूं, उससे पहले आगरा का भ्रमण किया था पर उसे घुमक्क्ड़ी की श्रेणी में नहीं रखता हूं। वैष्णो देवी का अनुभव बहुत ही शानदार रहा। सच कहें तो वो जगह मेरे मन में ऐसी बस गयी है कि हर साल एक बार वहां की हाजिरी लगा ही देता हूं।

6. घुमक्कड़ी के दौरान आप परिवार एवं अपने शौक के बीच किस तरह सामंजस्य बिठाते हैं?

@घुमक्क्ड़ी के लिए तो मुझे केवल आॅफिस से सामंजस्य बिठाना पड़ता है। पर घर में मेरी धर्मपत्नी का पूरा सहयोग मिलता है। यदि मैं घर में कह दूं कि फलाने तारीख को मैं फलाने जगह जाऊंगा तो उसके पहले दिन ही मेरा बस्ता मतलब कि मेरा सामान तैयार मिलता है और साथ में उसमें दो-चार दिन के खाने का सामान भी भर दिया जाता है। बस उनका एक छोटा सवाल होता है कि आने-जाने के लिए धन की व्यवस्था तो हो गई है ना। इसके अलावा स्कूल की छुट्टियों में मैं परिवार के साथ ही घुम्मकड़ी करता हूं। अब तो आॅफिस में भी लोग कहने लगे हैं कि अभय जी आपको घूमने की लत लग गई। हां मैं स्वीकार करता हूं यदि घूमना नशा है तो मैं नशा करता हूं, यदि घूमना पागलपन है तो मैं पागल हूं।

7. आपकी अन्य रुचियों के साथ बताइए कि आपने ट्रेवल ब्लाॅग लेखन कब और क्यों प्रारंभ किया?

@मेरा जुनून मेरी आशिकी तो बस अब देश-दुनिया घुमक्कड़ी ही है। मुझे पढ़ने और अपने कैमरे से तस्वीरें उतारने का भी बहुत शौक है। धार्मिक, ऐतिहासिक या पुरातात्विक संबंधी लेखन को ज्यादा पढ़ता हूं। जहां तक मेरे ट्रेवल ब्लाॅग लिखने का सवाल है तो बात इतनी सी थी कि जब मैं केदारनाथ जाने के लिए वहां के बारे में इंटरनेट पर कुछ खोज रहा था जिससे अपनी यात्राा को सुगम बना सकूं, लेकिन अफसोस, निराशा ही ज्यादा हाथ लगी, विशेषकर हिंदीभाषी और क्षेत्राीय भाषाओं को जानने वालों को इंटरनेट से जानकारी पाना अभी भी दूर की कौड़ी है। हिंदी में कंटेंट का अभाव है, वहां मुझे कुछ ऐसा विशेष नहीं मिला जिसके आधार पर अपनी योजना को मूर्त रूप दे पाता। बस फिर क्या था, मैने फैसला कर लिया कि कहीं से तो शुरुआत करनी ही पड़ेगी। तय कर लिया कि केदारनाथ बाबा के दर्शन के बाद ब्लाॅग बनाना है और वहां से लौटने के बाद अपने ब्लाॅग राही चलता जा को मूर्त रूप दिया और लिखना शुरू कर दिया। इसमें सबसे पहले मैंने केदारनाथ यात्राा पर ही अपनी पहली पोस्ट डाली, जिसका मुझे बहुत ही अच्छा रिस्पांस भी मिला। ब्लाॅग से जुड़ने वालों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है, उन लोगों के सुझाव हमारे लिए बहुत अनमोल हैं। मैं तो बस उनका सेवक बन अपना ब्लाॅग लिख रहा हूं जिससे अपनी यात्राा पर जाने वाले लोगों को कुछ सहूलियत हो सके।

8. घुमक्कड़ी (देशाटन, तीर्थाटन, पर्यटन) को जीवन के लिए आवश्यक क्यों माना जाता है?

@तीर्थाटन सदियों से हिन्दू धर्म का अभिन्न हिस्सा रहा है। घुमक्क्ड़ी से इंसान को हर जगह की सभ्यता और संस्कृति को नजदीक से देखने, जानने और समझने का अवसर मिलता है। घुमक्क्ड़ी ही वो चीज थी जिसने नरेंद्र नाथ को विवेकानंद बना दिया। सच कहूं तो “घुमक्कड़ी इंसान को बदल देती है” और यही वो चीज है जो इंसान को कल्पनिक दुनिया से हकीकत के धरातल पर लाती है, मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में भी लड़ने की शक्ति प्रदान करती है। दिन रात बस काम और काम करने वाले अभय को तो इस घुम्मकड़ी ने इंसानियत के मायने ही सिखा दिये।

9. आपकी सबसे रोमांचक यात्रा कौन-सी थी, अभी तक कहां कहां की यात्रााएं की और उन यात्राओं से क्या सीखने को मिला?

@यात्रा तो मैं केदारनाथ की यात्राा को ही मानता है जहां मैंने पहली बार ट्रेकिंग किया। वहां के ऊंचे पहाड़, गहरी घाटियां, बर्फ से ढंका हिमालय, प्राकृतिक मनोरम दृश्य और पल-पल बदलता मौसम एक अलग ही अनछुआ रोमांच पैदा करता है। अब तक जम्मू, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, दिल्ली सहित कई अन्य स्थानों की यात्रााएं की हैं। कुछ अनुभव अच्छे रहे कुछ बहुत अच्छे नहीं रहे। पर घुमक्कड़ी के दौरान एक बात मुझे सबसे ज्यादा अखरती है और दिल से दुखी भी हो जाता हूं कि लोग बड़े जोर शोर से तैयारी करके घर से चलते हैं, बहुत सारा अपने साथ सामान भी ले जाते हैं लेकिन दर्शन करने या यात्रा में मौज मस्ती करने के बाद बहुत सारा कचरा वहीं पर छोड़कर या यहां वहां बिखेर कर चले जाते हैं। ऐसा क्यों करते हैं? जिस श्रद्धा के साथ दर्शन करने जाते हैं उसी श्रृद्धा से अपने कचरे को भी सही स्थान पर ठिकाने लगाना चाहिए। वैसे हमारी प्रकृति हमारी धरा समय समय पर हमसे इसका हिसाब लेती रहती है। मेरी उन लोगों से अपील है कि ऐसा मत करें, ऐसा लंबे समय तक नहीं चल पायेगा। आज स्वच्छता अभियान को अपनी यात्रााओं के दौरान भी अमल में लाने की जरूरत है।

10. घुमक्कड़ों के लिए आपका क्या संदेश हैं?

@घुमक्क्ड़ी करने में मैं खुद ही नया हूं लेकिन यही कहूंगा “राही चलता जा बस चलता जा”। थोड़ा घर से बाहर निकलो, अपने परिवार के साथ निकलो, बाहर की दुनिया भी देखो। बड़ी न सही पर छोटी यात्रााओं पर तो जाओ, अच्छे इंसानों से मिलो और भारत माता को सुंदर बनाओ, स्वच्छ बनाओ। जय हिन्द, जय भारत। भारत माता की जय।।

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Posted by on Sep 11 2017. Filed under futured, कला-संस्कृति, घुमक्कड़ जंक्शन. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

76 Comments for “अभ्यानंद सिन्हा : घूमना पागलपन है तो मैं पागल हूँ।”

  1. वाह, अभ्यानंद जी । आज आपके जीवन के बारे काफी कुछ नया जानने मिला । घुमक्कड़ी के बारे में और स्वच्छता के बारे में आपके विचार जानकर बहुत अच्छा लगा । आप और मेरी अर्धांगिनी एक ही कॉलेज से पढ़े है । तो रिश्ता भी जुड़ गया । हालांकि हम दोनों एक ही राज्य से है, तो निकटता तो पहले से ही थी । भागकर घुमक्कड़ी का बढ़िया मजा लिया, हालांकि इसमें घरवाले ज्यादा परेशान होते हैं । ईश्वर आपको घुमक्कड़ी को और ऊँचे आयाम दे । यही शुभकामनाएं है । और ललित सर को कोटि कोटि प्रणाम ।
    जय हिंद

    • बहुत बहुत धन्यवाद मुकेश पांडेय जी, हाँ अपना परिचय तो पहले से ही है और निकटता भी धीरे धीरे बढ़ रही है और उम्मीद यही रहेगी और कोशिश भी यही रहेगी की ये नज़दीकियां कभी दूरियों में न बदले, भागकर घुम्मकड़ी का मजा तो लिया पर उस समय छोटा था सही गलत का ज्ञान नहीं था, पर अब सोचता हूँ तो बहुत दुःख होता है की मम्मी पापा और सब पर क्या गुजरी होगी, साथ ही ललित सर को भी बहुत बहुत आभार

  2. ललित सर (गुरुदेव) का बहुत बहुत आभार मेरे बारे में इतनी जानकारी सब तक पहुंचाने के लिए

  3. अनुराग चतुर्वेदी

    ललित जी को धन्यवाद, आपका सफर बहुत रोमांचक रहा घुम्मकण हो तो ऐसे हो, कौन भला इसे पागलपन कहेगा यह तो यात्रा है खुद को जानने की पहचानने की।
    बहुत शुभकामनाएँ आपको।⚘⚘ बस राही चलता जा.. चरेवति चरेवति।😊

    • बहुत बहुत आभार धन्यवाद आपका अनुराग जी, एक घुम्मकड़ को कुछ भी नाम दिया जाये उसके लिए एक विशेषण हो जाता है, बस राही चलता जा और चलता जा

  4. वाह !!!!! अच्छा लगा आपके बारे में जानकार…..ओर आपकी इतनी अच्छी जानकारी देने वाले “नीव के पत्थर को ह्रदय से आभार”

    • Abhishek pandey

      वाह ! बहुत अच्छा लगा आपके बारे में और आपके बिहार(घुमक्कड़ी) के बारे में जानकर । मैं आपको और गुरुदेव जी को बहुत बहुत धन्यवाद और शुभकामनाएं देता हूं।

      • धन्यवाद अभिषेक जी, आपको मेरे बारे में जानकर जितना अच्छा लगा उससे ज्यादा मुझे आपके कमेंट को देखकर लगा।

    • बहुत बहुत धन्यवाद महेश जी, चलिए आज जान गए न आप मेरे बारे में सब कुछ , बहुत लोग जानना चाहते थे, जो ललित सर के माध्यम से आज सब को पता लग गया

    • बहुत बहुत धन्यवाद महेश जी, चलिए आज जान गए न आप मेरे बारे में सब कुछ , बहुत लोग जानना चाहते थे, जो ललित सर के माध्यम से आज सब को पता लग गया ,,,,

  5. Sandhya Sharma

    वाह! स्वागत है इस पागलपन का, जिसने दुनिया को न जाने कितनी अनजान जगहों का परिचय दिया, प्रकृति को सहेजना और उसके साथ जीना सिखाया।
    शुभकामनाएं….

    • धन्यवाद संध्या जी, ये एक पागलपन ही तो जिसके नशे में हैं दुनिया देखने निकल पड़ते है,

  6. वाह मजा आ गया। आपके में बहुत कुछ नया जानने को मिला।

  7. Yogi Saraswat

    घूमने का कीड़ा जब जागता है तब धन , संपर्क की ज्यादा चिंता नहीं रहती !! मित्रवर अभ्यानंद जी की घुमक्कड़ी बहुत कुछ सीखने का जरिया है !! बढ़िया साक्षात्कार और धन्यवाद ललित शर्मा जी !!

    • जी सही कहा आपने जब घुमक्कड़ी न नशा चढ़ता है तो कुछ नहीं दिखता बस रास्ते नज़र आते है और मंजिल से कोई मतलब नहीं होता, ये तो पारिवारिक जिम्मेदारियां हैं जो घुमक्कड़ों को थोड़ी देर रोक लेती है जी वर्ण घुम्मकड़ कहा किसी का सुनते हैं

  8. बहुत बढ़िया लिखा ।मेरी भी पहली पर्वतीय यात्रा वेष्णो देवी ही थी। नमन आपको ओर आपके ललित सार को

    • हाँ बुआ जी वैसे घुमक्क्ड़ी की चाहत तो बचपन से ही था, पर अब आकर शुरू किया हूँ,

  9. वाह जीजा जी आप तो स्टार बन गए, अभी फ़ोन करती हूँ दीदी को बहुत कहती रहती हैं कि घूमने से क्या होगा , आज पता लगा जाएगा दीदी को घूमने से क्या होता है, वैसे दीदी तो कभी आपको रोकती ही नहीं कहीं जाने से, मैं किसकी तारीफ करू, आपके ट्रैवेलिंग की, आपके ब्लॉग की , या अपने दीदी की जो आपके जाने के लिए प्रोत्साहन देती है, या फिर न्यूज़ पेपर को जिसके कारण आपको आज बहुत लोग जाने, चलिए सबकी तारीफ कर देती हूँ, सबका मंगल हो,

    • धन्यवाद प्रियंका जी, कर लीजिये फ़ोन जी, आपका परिवार है कभी भी फ़ोन कर सकते हैं, आपको धन्यवाद भी नहीं कहुगा मिठाई आपके नाम के रखी हुई है

  10. santosh misra

    बहुत सुंदर विचार अभय भाई ….
    मस्त रहो ….
    जल्द ही मिलेंगे ।

    • मीठा मीठा धन्यवाद संतोष भाई, हाँ जल्दी ही मिलेंगे, घुम्मकड़ी दिल से मिलेंगे फिर से

  11. ललित जी और अभयानंद जी को धन्यवाद।
    “बड़ी न सही पर छोटी यात्रााओं पर तो जाओ,” सही कहा आपने। घुमक्कड़ी के लिए सभी स्थान रोचक हैं. अपनी अपनी परिस्थति के अनुसार, सभी घुमक्कड़ी का आनंद ले सकते हैं.

    • धन्यवाद और आभार आपका जयश्री जी, हाँ घुम्मकड़ी में बड़ी और छोटी यात्रा का कोई मायने नहीं होता, अपने परिस्थिति के अनुसार घुमक्कड़ी की जा सकती है,

  12. नरेश सहगल

    अभ्यानंद जी बढ़िया साक्षात्कार .आज आपके बारे में बहुत कुछ नया जानने को मिला।
    धन्यवाद ललित शर्मा जी ।।

    • बहुत बहुत धन्यवाद नरेश जी, ललित सर के सौजन्य से आप आज मेरे बारे में जान गए, आभार ललित सर का

  13. Vikas Uttank

    हार्दिक बधाई व ढेरों शुभकामनाएं। इस साक्षात्कार में आपका एक अलग व्यक्तित्व निखर कर सामने आया। यात्रा जारी रहनी चाहिए।

    • बहुत बहुत धन्यवाद आपका विकाश जी । हाँ जी ये यात्रा अनवरत जारी रहेगी, क्योंकि राही की कोई मंजिल नहीं होती उसके लिए तो रास्ते ही मंजिल होते हैं, तो यात्रा अनवरत चलती ही रहेगी

  14. Abhay ji Aapko ghumte hue dekh kar mujhe bahut acha laga, kash ham bhi aapke sath jate to mujhe bhee bahut khushi hoti, agar aage kabhi mauka mile to jaane ki koshish karunga, abhyanand jee mere taraf se bahut bahut dhanyvad

    • धन्यवाद सुरेंद्र जी, आपको इन्हीं बातों से हमें हौसला मिलता है, कोई बात नहीं जी अभी बहुत समय है कभी न कभी जरूर चलेंगे आपको अपने साथ लेकर , एक बार फिर से आभार आपका

  15. Abhay ji, aap apna kam karte hue itna yatra kar lete hai

  16. Abhay ji aap bahutmahan hain

  17. Great Abhyanand g, Your journey of roaming in India started 2 years back, and today in a very short span of time your interview was published in news paper, it is a matter of pride for you and your family memebers.You are doing great and i hope that in next years you will cover maximum toursit destination in the country.Keep it up and we are waiting for the day when google will published your inteview on Television.

    • धन्यवाद मृणाल आनंद जी , देखो कैसा संयोग है आपके नाम में भी आनंद है और मेरे नाम में भी, आपने मेरे लिए इतना दूर तक जाने का सोचा वो शायद क्या पक्का ही नामुमकिन है पर आपने ऐसा विचार किया मेरे लिए आपको साधुवाद जी

  18. Ravi Thakur

    बहुत बढ़िया सर जी.. यह मेरा सौभाग्य ह जो आपके साथ काम करने का मौका मिला… हर कोई यात्रा पर जाना चाहता है but जैसा आपने कहा “पहले पढ़ाई में उलझा रहा और फिर परिवार की जिम्मेदारियों ने मेरे कदमों को रोके रखा” यह लाइन हर किसी के साथ फिट बैठती है.. आपके द्वारा धिकाये गये फोटो और वीडियो वो सभी मन को मोह लेने वाले है..

    • धन्यवाद रवि, ये आपका बड्डपन है है जो आप मुझे इतना सम्मान दे रहे हैं, हाँ यात्रा बहुत लोग करना चाहते और हर व्यक्ति के साथ कुछ कारण होते हैं नहीं जाने के और मेरे साथ भी है जो अब भी है, पर उन्ही व्यस्त समय से कुछ लम्हे चुराकर यात्रा करनी पड़ती है

  19. Bahut achha.. apne anubhav ko share krne ka ek adbhut prayash

  20. बहुत अच्छा लगा पर घर मे बता कर निककलते तो घरवालों को चिंता कम होती । ।।

    • जब हम घर से भाग कर कर घूमे थे उस समय सही गलत का ज्ञान नहीं था जी, अगर ऐसा ज्ञान होता तो भागते ही नहीं

  21. प्रिय अभय,
    यूं तो व्हाट्स एप ग्रुप पर भी थोड़ी बहुत बातचीत हो जाती है परन्तु इस साक्षात्कार के माध्यम से आपका परिचय पहली बार ही मिला है और मन प्रसन्न है। ललित जी का आभार !

    आपके द्वारा बिना घरवालों को बताये की गयी पहली घुमक्कड़ी का वृत्तान्त पढ़ कर ही समझ आ जाता है कि आप कितने जबरदस्त वाले घुमक्कड़ हैं। वैसे आपको ऐसा करना नहीं चाहिये था। ये काम माता-पिता के लिये कितना कष्टकारक है, ये जानना हो तो कल्पना कीजिये कि आपका बेटा बिना आपको बताये चार-पांच दिन को चला जाये तो आप दोनों माता-पिता की क्या स्थिति होगी !!!

    वैसे मैं आपको सलाह तो दे रहा हूं, पर खुद भी ऐसा कर चुका हूं ! 😉

    • आदरणीय सिंघल साहब थोड़ा सा परिचय तो था ही और आपने आज पूरा परिचय पढ़ लिया , सर जी जब हम घर से अकेले निकले थे उस समय सही गलत का आभास नहीं था वरना ऐसा नहीं करते और दिल से कहूँ तो वहीँ वो पल था जिस दिन से मुझे घूमने का मन हुआ, लोगो से गांव में सब जगह के बारे में सुनता था तब तो गूगल था नहीं बड़े लोगो से ही जगह के बारे में सुनते थे और देखना चाहते थे, वाह सर जी मतलब आप भी घर से भाग कर घुम्मकड़ी का आनंद लिया है

  22. बहुत बढ़िया सर जी.. यह मेरा सौभाग्य ह जो आपके साथ काम करने का मौका मिला… हर कोई यात्रा पर जाना चाहता है but जैसा आपने कहा “पहले पढ़ाई में उलझा रहा और फिर परिवार की जिम्मेदारियों ने मेरे कदमों को रोके रखा” यह लाइन हर किसी के साथ फिट बैठती है.. आपके द्वारा धिकाये गये फोटो और वीडियो वो सभी मन को मोह लेने वाले है..

    • बहुत बहुत धन्यवाद रवि, ये आपका बड्डपन है है जो आप मुझे इतना सम्मान दे रहे हैं, हाँ यात्रा बहुत लोग करना चाहते और हर व्यक्ति के साथ कुछ कारण होते हैं नहीं जाने के और मेरे साथ भी है जो अब भी है, पर उन्ही व्यस्त समय से कुछ लम्हे चुराकर यात्रा करनी पड़ती है

  23. Aapne sabhi question ka bahut hi sunar jawab diya paripakwata najar aayi, Bhut kuch aapke baare me janne ko mila aapke ghar or aapke hobby k baare me in sabhi question k answer padhne k baad apka ek alag andaj saamne aaya iske sath hi aapne ek sandesh bhi diya jo bhut achi baat hai लोग बड़े जोर शोर से तैयारी करके घर से चलते हैं, बहुत सारा अपने साथ सामान भी ले जाते हैं लेकिन दर्शन करने या यात्रा में मौज मस्ती करने के बाद बहुत सारा कचरा वहीं पर छोड़कर या यहां वहां बिखेर कर चले जाते हैं। ऐसा क्यों करते हैं? जिस श्रद्धा के साथ दर्शन करने जाते हैं उसी श्रृद्धा से अपने कचरे को भी सही स्थान पर ठिकाने लगाना चाहिए

    • चलिए 5 साल साथ काम करके भी आप जो मेरे बारे में नहीं जान पाए वो आज आप जान गए बहुत बहुत आभार आपका, वैसे एक बात कहूँ तो सच में बहुत दुःख होता है जब कोई घूमने और यात्रा करने के बाद यहाँ वहां कचरा फेकता है, चलिए आपने मुझे आज जान लिए तो आज इस बात को आप भी मानिये कि यहाँ वहां कचरा नहीं फेक कर मेरे इस छोटे से साक्षात्कार को सफल बनाने में योगदान दें

  24. वाह अभ्यानंद जी! ललित जी के सौजन्य से पहली बार आपका इतना लम्बा परिचय मिला ! बचपन संघर्षपूर्ण रहा फिर भी घुमक्क्ड़ी के प्रति आपका रुझान तभी से था। घुमक्क्ड़ी के मर्म को भी एक संघर्षशील व्यक्ति ही समझ सकता है।
    आने वाले भविष्य में आप नित्य ऐसी अनवरत घुमक्क्ड़ी करते रहें और नयी-नयी उंचाईयों को छुएं! मेरी तरफ से आपको बहुत-बहुत शुभकामनायें!

    • धन्यवाद आर दी प्रजापति जी, हाँ मेरा बचपन बहुत ही संघर्षपूर्ण था और यदि संघर्षपूर्ण नहीं होता तो आज हम इतने मेहनती भी नहीं होते, आपने मुझे जो शुभकामनाएं दी उसके लिए बहुत बहुत आभार और साधुवाद आपका ,

  25. सिन्हा साहब काफी कुछ नया जाना आज आपके बारे में ललित जी के सौजन्य से ।
    बड़ी प्रसन्नता हुई अपने को आप जैसे मित्रों के बीच पाकर । हैप्पी घुमक्कड़ी

    • बहुत बहुत धन्यवाद आपका कौशिक साहब , चलिए आज आपने जान ही लिए मेरे बारे में, ललित सर का आभार , हैप्पी घुमक्कड़ी, वो भी दिल से

  26. सिन्हा जी बहुत कुछ जाना आप के बारे में। बस ऐसे ही घुमक्कड़ी जारी रखें।

    • बहुत बहुत धन्यवाद सचिन भाई, बस ऐसे ही अनवरत चलती रहेगी अपनी घुम्मकड़ी यदि ईश्वर ने चाहा तो

  27. वाह अभय भाई जी । आखिरकार आपके बारे में भी जानने को मिल ही गया , अच्छा लगा आपका साक्षत्कार , सुभकामनाये आपको , दिल से धन्यवाद ललित सर जी को

    • धन्यवाद रितेश भाई जी, ललित सर का आभार मुझे इस प्लेटफार्म पर लाने के लिए, आभार और साधुवाद आपको

  28. बहुत बढिया सिन्हा जी

  29. भाई अभ्यानन्द जी, सर्वप्रथम आपको बधाई तथा श्री ललित शर्मा जी का आभार, जिनकी इस शानदार पहल ने घुमक्कड़ों का हौसला बढ़ाने और उनके, घुमक्कड़ी अनुभवों से नये घुमक्कड़ों को नयी उड़ान का आसमान मिला है । बड़ा उम्दा और दिल से साक्षात्कार दिया गया । बचपन में लगाया गया घुमक्कड़ी का पौधा, आज वृहद वृक्ष बन गया, पारिवारिक सपोर्ट बहुत बड़ा कारक है आपके सफल घुमक्कड़ी जीवन का, वो भी बधाई के पात्र हैं । मैं तो बस यही कहूंगा कि राही चलता जा, रूक जाना नहीं तू कहीं हार के. ..

    • बहुत बहुत धन्यवाद आपको और ललित सर का आभार जो आज आप हमारे बारे में पढ़ रहे हैं, हाँ घुमक्कड़ी का पौधा तो बचपन में ही लग गया था, अब तो एक एक पेड़ बन गया और उसका श्रेय मेरे पूरे परिवार को जाता है और खासकर कंचन जी को जिनके तरफ से मुझे पूरा पूरा सहयोग मिलता है , मेरी घुम्मकड़ी उनके ही कारण है , बस राही चलता जा, राही चलता जा

  30. Priyanka Raj

    बहुत अच्छे। ऐसे ही नई नई जगह विचरण कीजिये अपने परिवार के साथ और ज़िन्दगी का लुत्फ उठाइये। और हम नए यात्रियों को अपने अनुभव बाटतें रहें।

    All the best…..

    • बहुत बहुत धन्यवाद आपको और ललित सर का आभार जो आज आप हमारे बारे में पढ़ रहे हैं, हाँ घुमक्कड़ी का पौधा तो बचपन में ही लग गया था, अब तो एक एक पेड़ बन गया और उसका श्रेय मेरे पूरे परिवार को जाता है और खासकर कंचन जी को जिनके तरफ से मुझे पूरा पूरा सहयोग मिलता है , मेरी घुम्मकड़ी उनके ही कारण है , बस राही चलता जा, राही चलता जा

    • धन्यवाद प्रियंका जी, बहुत बहुत आभार आपका जो आपने अपना समय देकर मेरे इस साक्षात्कार को पढ़ा

  31. भाई अभ्यानन्द जी, सर्वप्रथम आपको बधाई तथा श्री ललित शर्मा जी का आभार, जिनकी इस शानदार पहल ने घुमक्कड़ों का हौसला बढ़ाने और उनके, घुमक्कड़ी अनुभवों से नये घुमक्कड़ों को नयी उड़ान का आसमान मिला है । बड़ा उम्दा और दिल से साक्षात्कार दिया गया । बचपन में लगाया गया घुमक्कड़ी का पौधा, आज वृहद वृक्ष बन गया, पारिवारिक सपोर्ट बहुत बड़ा कारक है आपके सफल घुमक्कड़ी जीवन का, वो भी बधाई के पात्र हैं । मैं तो बस यही कहूंगा कि राही चलता जा, रूक जाना नहीं तू कहीं हार के. ..

  32. surender kumar

    good mornig abhay jee aap bhut acche aadmi hai agar mai bhi aap ka bat man kar aap ke sath chala jata to bhut aacha hota kass mai bhi ghum leta to kitni khusi hota gab ki aap mujhe rupya bhi de rhethe gumne keliye abhay g aap ko gumne ke liye bhut bhut dhanybad surender kumar yadav bihar east champaran mo no 9999839147

  33. sanjai singh

    क्या बात है? मजा आ गया पढ़ने में और आपके बारे में जानने का मौका मिला तथा अंत में सफाई की जो बात कही वह भी अच्छा लगा

    • बहुत बहुत धन्यवाद जी, साफ सफाई जैसे हम अपने घर और ऑफिस में रखते हैं वैसे ही हमें उन जगहों का भी ख्याल रखना चाहिए, तभी आप घुम्मकड़ी का असली मज़ा ले सकते हैं, सोचिये जिन जगहों पर गंदगी फैली हो वहां कोई जाना चाहेगा

  34. भाई सुरेंदर जी आपको बहुत धन्यवाद जी, और आप नहीं गए तो मायूस न हों, अभी बहुत मौके आएंगे जाने का तब आप मन मत कीजियेगा और ये नंबर जो आपने यहाँ अपना दिया है उसकी कोई जरूरत नहीं है, आपका नंबर मेरे पास है , और अगली यात्रा में आपको ले चलेंगे

  35. बहुत अच्छे। परिचय तो मिला ही बहुत कुछ जानने को भी मिला। हर असाधारण व्यक्ति के जीवन की शुरूआत साधारण ही होती है। और घुमक्कड़ी तो एक जुनून की तरह है जिसमें दुनिया की जटिलताओं की वजह से तमाम समझौते हमें करने पड़ते हैं वरना मानव तो पैदाइशी घुमक्कड़ है। बस आगे भी इसी तरह घूमते रहिए और जुगनू की तरह रास्ते में उजाला करते रहिए। बहुत बहुत धन्यवाद ललित जी को भी।

    चरैवेति चरैवेति।

    • बहुत धन्यवाद जी, आपका आभार मेरा भी साधुवाद भी। सही कहा आपने घुम्मकड़ी एक जुनून है, एक नशा है, एक लत है , घुमक्कड़ी से व्यक्ति को बहुत चीज़े सीखने के लिए मिलता है, और वो संघर्षपूर्ण स्थिति में भी अपने आपको को संतुलित रख पाता है, कुछ लोग घुम्मकड़ी का मतलब मानते है की कही जाना और होटल में कुछ दिन बिता कर वापस आ जाना ये घुम्मकड़ी नहीं पर्यटन है, और घुम्मकड़ी तो वो होती है जहाँ जाकर आप चाहे थोड़ा सा ही सीखते हो, उस जगह से उस परिस्थित से साक्षात्कार करते हैं। जय घुम्मकड़ी , और ललित सर का आभार तो सदा ही रहेगा जिनके कारण हम लोगो के सामने आ सके

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