शौचालय निर्माण से पहले जलस्रोतों के संरक्षण की आवश्यकता

सम्पादकीय

वर्तमान में जल संकट का सामना ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरों तक मनुष्य को करना पड़ रहा है। नदियाँ सूख रही हैं, कूप एवं तालाब सूख जाते हैं, बांधों में जल का स्तर कम हो जाता है, घर घर में बोरवेल के कारण भूजल का स्तर भी रसातल तक पहुंच रहा है। जहाँ दस हाथ की खुदाई से जल निकल आता था वहाँ हजार फ़ुट में भी जल निकलने की संभावना नजर नहीं आती।
इसके साथ ही हर वर्ष ग्रीष्म काल में जल संकट से वन्य प्राणियों के जान गंवाने के समाचार निरंतर आते रहते हैं, परन्तु लोग इस ओर ध्यान नहीं दे रहे। नलकूपों द्वारा जल का असीमित दोहन हो रहा है। दिनचर्या में सम्मिलित ऐसा कोई भी कार्य नहीं है जो जल के बिना सम्पन्न हो सके। जहाँ भी जल संकट आता है वहां के लोग शासन प्रशासन को लानते भेजना प्रारंभ कर देते हैं परन्तु स्वयं की जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं।
पहाड़ों की ये स्थिति है कि वहाँ भी पेयजल नहीं है। मीलों दूर से जल की व्यवस्था करने पर मजबूर हैं। चीड़ ने पहाड़ों का सारा जल निचोड़ लिया है। लोग मैदानों की तरफ भागे आ रहे हैं, पर कब तक चलेगा यह सब। इसकी भी एक सीमा है। जल के संसाधन पहाड़ों पर भी बचाने होंगे।
आज से तीस बरस पहले मीठे पानी का एक कुंआ ही गाँव भर की प्यास बुझा देता था, निस्तारी के लिए तालाब का जल उपयोग में आता था। जब आज सब नल जल के भरोसे हो गए तो कुंए, बावड़ियों, तालाबों आदि की दुर्दशा देखी नहीं जाती। कभी पेयजल का स्रोत रहे इन साधनों में वर्तमान में लोग कूड़ा कचरा फ़ेंकते दिखाई देते हैं, जिससे प्राकृतिक जल स्रोत प्रदूषित हो गए हैं या बंद हो गए हैं। तालाबों की भूमि अतिक्रमण के कारण सिमटती जा रही है और आबादी बढती जा रही है। लोग शतुरमुर्ग की तरह भूमि में गर्दन गड़ाए सभ्यता को समूल नष्ट करने वाले तूफ़ान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
जब भी किसी कुंए या प्राकृतिक जल स्रोत की दुर्दशा देखता हूँ तो आत्मा कलप जाती है और सोचता हूं कि मुर्ख मनुष्य अपनी ही जाति के समूल नाश का उद्यम कर रहा है। रजवाड़ों के काल में शासक, जमीदार एवं धनी मानी व्यक्ति कुंए, बावड़ियाँ, पुष्करी, तालाब आदि लोककल्याण के भाव से निर्मित करवाते थे तथा इस कल्याण का कार्य करने के लिए शास्त्र भी नेति-नेति कहकर उन्हें प्रोत्साहित करते थे। परन्तु वर्तमान में सब खत्म होते जा रहा है।
हम देख रहे हैं कि आज एक लीटर पानी की कीमत 20 रुपए हो गई है, जो लोग सहर्ष लेकर पीते हैं, घरों में आर ओ का जल आ रहा है। लोगों ने घरों में जल शुद्धि के आर ओ मशीने लगवा ली हैं। जबकि आर ओ में एक लीटर जल शोधन करने के लिए तीन लीटर जल व्यर्थ जाता है। इस वर्तमान को देखकर भविष्य की चिंता होती है कि आने वाला कल कितना भयानक हो सकता है।
पर्यावरण रक्षा के लिए असली नकली गुहारें होती दिखाई देती हैं। मानता हूँ कि पर्यावरण के साथ इको सिस्टम भी सुधारना आवश्यक है। परन्तु सबसे पहले गाँवों एवं शहरों के पुराने पेयजल के स्रोतों को भी बचाना आवश्यक है। जो कुंए, तालाब बावड़ियाँ हैं, उनकी सफ़ाई करके उनका जल प्रयोग में लाना प्रारंभ करना चाहिए, जिससे वर्षाजल से धरती सींचित हो सके एवं भूजल का स्तर बढता रहे।
स्थानीय शासन एवं सामाजिक संस्थाओं को सबसे पहले इस ओर ध्यान देना चाहिए। जो जल के प्राचीन स्रोत हैं, उनकी सफ़ाई करवा कर मरम्मत करवानी चाहिए जिससे उनका संरक्षण हो सके। अभी भी समय है, यह आवाज हर जगह उठनी चाहिए। जल है तो सब कुछ है, यह चराचर सृष्टि है, प्राण है, जीवन है, वन्य प्राणी हैं, इको सिस्टम है, वरना सब नष्ट हो जाएगा। बहुत देर हो जाएगी और आने वाली पीढी आपको कोसने एवं लानते भेजने के अलावा क्या कर सकती है। सरकार को भी चाहिए कि वह प्राचीन जल के स्रोतों को बचाने की कोई योजना बनाए जो कारगर हो एवं इसका लाभ जन जन को हो। शौचालय के पहले जल स्रोतों के संरक्षण की आवश्यकता है।

Short URL: http://newsexpres.com/?p=1567

Posted by on Jun 24 2017. Filed under सम्पादकीय. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

1 Comment for “शौचालय निर्माण से पहले जलस्रोतों के संरक्षण की आवश्यकता”

  1. रोचक व उपयोगिक पोस्ट

Leave a Reply

Photo Gallery

Log in | Designed by R.S.Shekhawat