विवाहेत्तर संबंध और वर्तमान

आधुनिक युग में जीवन की परिभाषा बदलती जा रही है। रिश्तो के बीच दूरियाँ और मजबूरियां आ रही है। रिश्तों – की  बैशाखियों  से जिन्दगी घिसट-घिसट कर जी रहे हैं लोग … सीता-राम और राधे-कृष्ण की धरा पर मर्यादा आज द्रौपदी की चीर की तरह लुटती जा रही है . पाश्चात्य संस्कृति दु:शाशन की तरह भारतीय संस्कृति का चीरहरण कर रही है और हम बेबस होकर मूक दर्शन कर रहे है ..चिंतन करने पर हमारे समक्ष एक प्रश्नचिन्ह उपस्थित होता है कि समाज में विवाहेत्तेर संबंधो के लिए जिम्मेदार कौन ??
आज का एकाकी परिवार पडोसी धर्म को भूलकर चौबीसों घंटे टी.वी. और कंप्यूटर कि दुनिया में चिपके रहते है. टी वी में धारावाहिकों की बाढ़ सी आ गई है, प्रायः हर धारावाहिक में परपुरुष और परपत्नी के प्रति आकर्षण और विवाहेत्तर संबंधो को तार्किक रूप से जायज ठहराकर परोसा जाता है, ऐसे संबंधो का समर्थन किया जाता है. जिसे देख देखकर दर्शक भी अपने दांपत्य जीवन में कमियां ढूंढने लगते है और आकर्षण कि डोर परायो से बांधने चल पड़ते है, एक अनजान डगर पर कदम रखते हुए वह  परिणाम से जानबूझकर अनभिज्ञ बन बैठता है .
जिन्दगी का सफ़र इतना व्यस्त हो गया है कि पति को वक्त नही है कि वह पत्नी कि चाहतों सो समझे, उसकी छोटी-छोटी खुशियों का ख्याल रख सके, कभी अवकाश के दिनों में अपने व्यस्त कार्यालयीन उलझनों से परिवार के लिए वक्त निकाले और पत्नी एवं बच्चों को बाहर घुमाने ले जाये. पत्नी की समस्याओं को सुने, समझे और समाधान करे. पत्नी को पति रूपी सुरक्षा कवच की आवश्यकता हर कदम पर होती है . पत्नी कितनी भी सक्षम हो, काबिल हो,  पर दाम्पत्य जीवन में पति का सहारा उसे और अधिक संबलता प्रदान करता है.
सिक्के का दूसरा पहलु यह भी है कि,पति कार्यालय से थका हारा घर कि चारदीवारी में कदम रखता है और शुरू हो जाती है , पत्नी कि शिकायते , उलाहना ,और बिना बात कि बहस .. किसी पति का नसीब अच्छा हो तो , इन सारी मुसीबतों का सामना नही करना होता ..पत्नी मूक-बधिर सी बैठी होती है …. टीवी. सीरियल में खोई ..पति कि हर मांग को अनसुना  कर धारावाहिक का आनंद लेती रहती है , यही लापरवाही कभी-कभी उसे धकेल देती है. पीड़ा भरी राहों में.. पति तलाश लेता है कोई और जो उसे सुने और उसकी परवाह करे ….
क्यों नही समझ पति वह कि थका हारा पति जब घर लौटता है , तो पत्नी उसे प्रेयसी के रूप में मिले ये चाहता है .सजी संवरी , हाथ में चाय कि प्याली, अधरों पर मुधुर मुस्कान , जो उसकी हर बात को चाव से सुने , हंसी ठिठोली के वातावरण में जीवन को रसमय बनाये ..न चाहकर भी वह आहिस्ता आहिस्ता अपने व्यवहार से पति को दूर करती है …
आज कि दुनिया में सबसे बड़ी सौत है पति-पत्नी दोनों की.. ………..? कौन…………….?????? अरे भाई इन्टरनेट ….. फेसबुक , ट्विटर ,ऑरकुट  जाने कितने सोशल नेट्वर्किंग साईट है जिसमे इन्सान परिवार को भूलकर घंटो खोया रहता है . दांपत्य में दूरिया आने के अनेक घटक है , पर सभी में चर्चा करना आज संभव नही है ..
सारांश यही है कि पति हो या पत्नी .. समझना इस बात को है कि वो चाहते क्या है , अपने जीवनसाथी से .. थोडा सा प्यार , थोडा सा अपनापन ,थोड़ी सी तारीफ और थोडा सा विश्वाश …
और यह सब उसे घर में नही मिलता तो निगाहें तलाशती है  आसपास कि दुनिया में कोई ऐसा, जो उसे समझ सके , जिसे उसकी कदर हो .जो उसकी खूबियों कि तारीफ करे , जो मुश्किल घडी में उसका साथ दे  और सबसे अहम बात ………उसे पूरा वक्त दे ..समझने वाले साथी कि दरकार उसे हर कदम पर होती है … एक ऐसा साथी जो उसे समझ सके , जिससे वह अपनी खुशियां बाँट सके , जिसके हाथ पीड़ा के पलों में उसके आंसु पोंछ सके , जो उसकी तन्हाई के दर्द को समझ सके ,जो समय पर प्रसंशा करे और वक्त पर उसे उसकी गलती का एहसास भी कराये ……………………..
आज वक्त नही है , किसी के पास , किसी के लिए …….. अपना पराया होता जा रहा है और पराये अपने ………..कामकाजी पत्नी पर जिम्मेदारी का दोहरा  बोझ होता  है . घर कि जिम्मेदारियों के साथ साथ उसे कार्यालय में भी अपना स्थान उत्कृष्ट बनाना होता है .घूरती नजर और बाहरी दुनिया के स्वार्थपरस्त लोंगो से बचकर काम कर पाना आसान नही होता. गंभीरता से रिजर्व होकर कार्य करे तो घमंडी …जाने अपने आप को क्या समझती है ,,जिससे उलाहना  और सबसे मिलजुल कर रहे तो ………..वो तो ऐसी है , वैसी है… जितनी मुंह उतनी ही बाते .
 क्यों भूल जाते है लोग कि वो भी किसी कि पत्नी है , किसी कि माँ है . किसी के बारे में अपशब्द  कहने वाले भूल जाते है कि उनके घर में भी नारी है, जिसने उसे जनम दिया है……ऐसी स्वार्थपरस्त दुनिया में जब कोई दोस्ती का हाथ बढाता है , कुछ पल हंसी – ठिठोली के साथ मुस्कुराकर गुजरता है , तो ऐसी दोस्ती पर भी दुनिया प्रश्नचिन्ह स्थापित करने लगती है …
यह भी सत्य है कि आधुनिक समाज में दोस्ती कि आड़ में विवाहेत्तर संबंधो कि कमी नही …. भौतिक सुखों के लिए रिश्तों की बलि दी जा रही है  और इसे उचित ठहराने के लिए कई तर्क भी प्रस्तुत किया जाता है ,…
यह धरा मर्यादा पुरुषोत्तम राम की  है , अग्निपरीक्षा देने वाली सीता की है .. अतः किसी भी प्रतिकूल परिस्थिति  में भी अपने जीवन मूल्यों को सहेजकर नैतिकता की राह में चलना  चाहिए .. क्षणिक सुखों के लिए जीवनसाथी से बेवफाई करना सर्वथा अनुचित है ..कुछ पल ख़ुशी की चाह में  जीवन भर का दर्द मोल लेना महज बेवकूफी है, अन्यथा स्वयं का जमीर आपको जीने नही देगा  और निंदा की राह में हर पर दर्द के कांटे चुभते रहेंगे ..
उलझन और कशमकश से भरी जिन्दगी में कोई ऐसा दोस्त जो वक्त में आपका साथ निभाए . दो पल के लिए आपके अधरों को मुस्कान दे ……….. तो स्वागत कीजिये उस दोस्त का ………..”कोई जरुरी नही की वो आपका प्यार हो …गर्लफ्रेंड या ब्वायफ्रेंड हो ………. वो ऐसा दोस्त भी हो सकता है .. जिसे आपकी फिक्र हो .. और आपको उसकी क़द्र हो ……………… कोई ऐसा दोस्त जरुर हो,  .. दोस्ती ….से संवर जाएगी आपकी वीरान राहे ……………
रायपुर छत्तीसगढ

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