लांस नायक वेदराम

सामने पहाड़ी पर एक टक निगहबानी करती हुई मेरी एक जोड़ी आंखे जमी हुई बर्फ़ को देख रही थी। दूर तक कहीं हरियाली का नाम-औ-निशान नहीं। चारों तरफ़ बर्फ़ ही बर्फ़ धवल और शुभ्र। मैं लांस नायक वेदराम अपनी एल एम जी बंकर में मजबूती से संभाले हुए चौकस था। पिछले 5 महीनों से इस फ़ील्ड पर वह अपनी ड्युटी बजा रहा था। बड़ा कठिन होता है नो मेंस लैंड पर ड्युटी करना, जहां आम सुविधा तो क्या, दैनिक निवृति भी मुस्किल से होती है। पता नहीं कब बंकर से बाहर निकलते ही पहाड़ी के पार से आती गोलियां शहीद का दर्जा बख्श दे प्रमाण पत्र के साथ। 
मन कल से ही उदास था। रह-रह कर बस सुक्खी की याद आ रही थी।घर में बूढी माँ अकेली थी। बहन की शादी तो मैं कर आया था पिछले जाड़ों में। एक जिम्मेदारी जो थी उसे निभा आया था। परिवार की जिम्मेदारी भी बहुत बड़ी होती है जब घर का एकमात्र पुरुष घर से दूर रहे। जब भी मैं घर जाता तो माँ याद दिलाती कि-“ सुक्खी बड़ी हो गयी है, उसके हाथ पीले कर देने चाहिए, अच्छा सा लड़का देखकर”। अब की  छुट्टियों में मैं यही सोच कर गया था कि-कैसे भी हो सुक्खी के हाथ पीले कर के ही वापस आऊंगा।

सुक्खी मुझसे दो साल छोटी थी, पाकिस्तान की लड़ाई में पिताजी के शहीद होने के बाद माँ ने हमें बड़ी तकलीफ़ों से पाला था। 300 रुपए की पेंशन में घर का गुजारा नहीं होता था।आर्मी वेलफ़ेयर एसोसिएशन की कुछ अफ़सरों की बीबियां माँ को एक सिलाई मशीन देकर गयी थी और उसकी फ़ोटो दूसरे दिन अखबारों में छपी थी। तब से माँ ने सिलाई का काम शुरु कर दिया। हम भी उसका हाथ बंटाते । कभी सुक्खी मेरे साथ छेड़खानी करती, मेरी स्लेट लेकर बैठ जाती। माँ मैं भी स्कूल जाउंगी। माँ से मैं उसकी शिकायत करता-“माँ देख सुक्खी मेरी स्लेट नहीं दे रही है। मुझे अभी स्लेट पर ईमला लिख कर ले जाना है।“ माँ हंस कर कहती-“दे दे सुक्खी भाई की स्लेट, मैं तुझे दूसरी ला दुंगीं।“ माँ के कहने से भी नहीं देती थी स्लेट, तब मैं उसकी चुटिया पकड़ कर खींचता तो वह नाराज हो जाती।

उसे मनाने के लिए स्कूल से आते हुए ढोलुराम बनिए की दुकान से पोदीने वाली टिकिया लेकर आता। आते ही आवाज देता-“ सुक्खी-देख तेरे लिए मैं क्या लाया हूँ? आवाज सुनकर वह दौड़ कर बाहर निकल आती और कहती-“ माँ मेरा भाई कितना अच्छा है, मेरे लिए कितना कुछ लेकर आता है।“ उसकी बातें सुनकर माँ मुस्कुराती और मैं भी हंसने लगता था-कितनी भोली है मेरी बहन। सुबह झगड़ा किया था और नाराज थी, पोदीने की टिकिया मिलते ही अब राजी हो गयी।फ़िर हम दोनो लंगड़ी खेलने लगते और खूब धमा चौकड़ी मचाते।

इस तरह हमारा बचपन बीतता गया। मैने मैट्रिक पास कर ली थी अब 17 का हो गया था। मां से पूछता-“माँ तुम्हारी उमर कितनी है? तो माँ कहती-“बेटा जब तु 20 बरस का हो जाएगा तो मैं 40 बरस की हो। तेरे पिताजी के जाने के बाद एक-एक दिन और पल गिन रही थी कि तु कब बड़ा होगा।“ सुक्खी भी अब स्कूल जाने लगी, वह रोज स्कूल जाती और वापस आकर माँ के सिलाई के काम में हाथ बंटाती। सिले हुए कपड़ों पर बटन और हुक टांगती। फ़िर अपनी पढाई करती। गाँव में बिजली नहीं थी। इसलिए हमें पढाई का काम अंधेरा होने से पहले ही पूरा करना पड़ता था। माँ के पास अब सिलाई का काम बहुत बढ गया था। इसलिए हम सब मिल जुल कर काम को करते ।

एक दिन अमर सिंग ने बताया कि-पानीपत में फ़ौज की भरती शुरु हुई है। गांव से बहुत सारे लड़के जा रहे हैं। तो मैने माँ से कहा-“माँ गाँव से मेरे साथ के बहुत सारे लड़के पानीपत में फ़ौज में भर्ती होने जा रहे हैं। अगर तू कहे तो मैं चला जाऊं ।“ तो माँ सुनकर उदास हो गयी, आसमान में ताकने लगी, उसकी आँखे डबडबा आईं, थोड़ी देर में फ़िर बोली-“जा बेटा हमारे खानदान में तो पीढियों से परम्परा रही है,फ़ौज की नौकरी करने की। फ़िर उसने अपने पल्लु में बंधे 28  रुपए दिए। रोटियों को चूर कर चूरमा बनाया,मुझे पिताजी का मेडल देना नहीं भुली और माथे पर हाथ फ़ेर कर कहा-“जा बेटा भर्ती हो जा।“
पानीपत पहुंच कर मैने अपने पिताजी का मेडल वहां बैठे भर्ती ऑफ़िसरों को दिखाया और उन्होने मुझे भी लाईन में लगा दिया। नाप-जोख, भाग-दौड़ होने के बाद दुसरे दिन मुझे किट बैग थमा दिया गया और सीधे वहीं से बेसिक ट्रेनिंग कोर्स के लिए भेज दिया गया। 6 माह की रंगरुटी के बाद मेरी पोस्टिंग यहाँ बार्डर पर हो गयी। पिछली छुट्टियों में घर गया था तो माँ के लिए साड़ी, सुक्खी के लिए कैंटिन से एच एम टी की घड़ी लेकर आया था। उसे घड़ी का बड़ा शौक था। हमेशा घड़ी के लिए मुझे कहती थी लगता था कि इस घड़ी के बिना वह घड़ी भी नहीं रह सकती।
अबकी छुट्टियों में उसके लिए कैंटीन से मैने बहुत सा सामान खरीदा और घर पहुंच गया। माँ ने सुक्खी के दहेज के लिए काफ़ी कुछ जरुरतों का सामान जमा कर रखा था। काफ़ी तलाश के बाद एक लड़का पास के गांव में मिल ही गया। वह गोविंद गढ में स्कूल मास्टर था। धूम धाम से शादी हो गयी और सुक्खी अपने घर चली गयी। बचपन में मेरा जब उससे झगड़ा होता तो माँ कहती –“तू मत लड़ रे उससे, वो तो पराई है एक दिन तुझे छोड़ कर चली जाएगी, ये तो चिड़िया है,चिड़िया एक दिन उड़ जाएगी।” तब तो मेरी समझ में नहीं आता था कि माँ ऐसा क्यों कहती है। उसका विदा करके मैं जी भर रोया। आंसू रुकते ही नहीं थे। सुक्खी अपने घर चली गयी थी, चिडिया उड़ चुकी थी।
बस इस बात को बरसों बीत गए। भाई-बहन के जीवन में बरस में एक विशेष दिन आता है जब दोनो एक दूसरे को बहुत याद करते हैं, चाहे दुनिया के किसी कोने में भी हों इस दिन मिल ही लेते हैं। राखी के एक दिन पहले हमेशा उसका राखी का लिफ़ाफ़ा हजारों किलोमीटर दूर कदमों से चलकर मेरे पास आ जाता था। दूसरे दिन सभी साथियों की तरह मेरी भी कलाई पर राखी सज जाती थी जैसे किसी ने शौर्य चक्र मेरे सीने पर लगा दिया हो और दिन भर मैं तनकर खड़ा रहता था अपनी एल एम जी के साथ, जिस पर सुक्खी की भेजी एक राखी बंधी होती थी। एल एम जी मेरी रक्षा करती, मैं एल एम जी की और सुक्खी की राखियों में समाया प्रेम हम दोनो की रक्षा करता।

मैं इतजार कर रहा हूँ सुक्खी के लिफ़ाफ़े का जो खुशियां लेकर आएगा मेरे लिए। जिसमें होगीं सलामती की लाख दुवाएं, जिसकी मुझे हमेशा जरुरत रहती है, हरकारे की आवाज का इंतजार कर रहा हूं जब वह कहेगा-“ लांस नायक वेदराम! तुम्हारी राखियाँ आ गयी हैं अब जरा सी रम पिला दे यार।“ मैं भी खुशी से आधी बोतल उसके गिलास में उड़ेल दूंगा।  वह भी मस्त हो जाएगा। भाई बहन के प्रेम के गीत गुन-गुनाएगा। यह खुशी ही कुछ ऐसी है। अब जब भी सूनी कलाई पर मेरी निगाह पड़ती है, एक हूक सी दिल में उठती है, एल एम जी पर मेरा हाथ कस जाता है, क्योंकि आज दोनो ही उदास है, मेरी कलाई भी सूनी है और एल एम जी का ट्रिगर  भी……. 

माँ की चिट्ठी आई थी मैं मामा बनने वाला हूँ। बहुत खुश हुआ था सुनकर मैं। ऐसा लगता था कि अभी उड़कर उसके पास पहुंच जांऊ। एक बार सुक्खी से मिल आऊं। कैसी है वह। बस दिन यों बीतते गए और मैं खुशखबरी का इंतजार करता रहा। एक दिन चिट्ठी आई कि मैं मामा बन गया हूँ,खुशी के साथ दुख: का एक पहाड़ भी टूट पड़ा मेरे उपर, आगे चिट्ठी में लिखा था-“ जापे (जचकी) के दौरान सुक्खी की तबियत बिगड़ गयी और वह अपनी निशानी छोड़कर चली गयी। चिड़िया थी अनंत आकाश में उड़ गयी। मुझे तो लगा कि पाला मार गया, सारा शरीर सुन्न हो गया। हे भगवान! ये कैसा न्याय है तेरा? बरसों से खुशियों को तरसने वालों को तू खुशी का एक मौका न दे सका। बस यूं ही खड़ा रहा मैं अपनी एल एम जी के साथ और चिड़िया उड़ गयी है मेरे आंगन की अनंत आकाश में……..

चित्र-गुगल से साभार

ललित शर्मा

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Posted by on Jan 9 2011. Filed under कहानियां. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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