मक्खियों ने बना दी छ: गांवों की जिन्दगी नरक : छत्तीसगढ़

सत्यप्रकाश पान्डेय फ़ोटो जर्नलिस्ट

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से महज 70 किलोमीटर दूर लगे करीब 6 गाँव की जनसंख्या मक्खियों की आबादी के बीच काफी कम नज़र आती है। यहां आम अवाम से ज्यादा मक्खियों की तादात है। इन गाँवों में बसती जिंदगी मक्खियों को बिछाती है, उन्हें ओढ़ती है। उनके साथ खाना खाती हैं और उन्ही के साथ आराम करती है। मख्खी बाहुल्य जनसंख्या वाले इन गाँवों की तस्वीर जितनी वीभत्स और भयानक हैं उससे कहीं ज्यादा खतरनाक भविष्य दिखाई पड़ता है। यहां की भिनभिनाती जिंदगी के सच को जब मैंने करीब से देखा तो कई बातें, कई पहलु सामने आये जो हजारो-हजार जिंदगी के भविष्य पर गंभीर बीमारियों के अलावा लोगों के चैन-ओ-सकून पर ख़तरा बनकर पूरे वक्त मंडरा रहा है। इस मामले में स्वास्थ्य विभाग की अनदेखी अब तक समझ से परे है। यकीन मानिये समय रहते स्वास्थ्य अमले ने ध्यान नहीं दिया तो इन गाँवों में महामारी का फैलता स्लो पाइजन विकराल रूप ले लेगा।

बलौदा बाज़ार विधानसभा के तिल्दा विकासखंड के ग्राम बिलाड़ी, सिनोधा, खपरी, केसदा, रिंगनी और परसदा। ये वो गाँव हैं जहां पिछले एक दशक में मक्खियों की आबादी गाँव की आबादी से कइयों गुना बढ़ गई है। एक दो या फिर तीन नहीं बल्कि पूरे 6 गाँव के बाशिंदे मक्खियों के आतंक से दहशत में जीते हैं मगर उनसे निपटने का स्थाई इलाज अब तक नहीं ढूंढ पाये हैं। ये वो गाँव है जिन्हें पिछले एक दशक से मक्खियों ने अपना स्थाई निवास बना लिया है । मक्खियों के सर्वाधिक प्रकोप वाले गांव बिलाड़ी, सिनोधा और केसदा में भिनभिनाती जिंदगी अब जैसे तैसे गुजरती है क्योंकि ना सोते बनता है ना खाते । लोग परेशान तो हैं लेकिन उनके आतंक से निपटने का कारगर उपाय ना मिलने की वजह से अब उनके बीच रहने के आदि हो चुके हैं ।

खाना खाते वक्त हजारों की तादात में मख्खियां

ग्राम सिनोधा में रहने वाली मितानिन सावित्री बाई वर्मा बताती हैं मक्खियों की तादात पिछले एक दशक में बढ़ते बढ़ते इतनी भयानक रूप ले लेगी अंदाज नही था । हजारों रूपये के कीटनाशक ख़त्म हो गए मगर मक्खियों के आतंक से छुटकारा नही मिला । उनका कहना है गाँव में किसी के यहां सुख-दुःख के काम में बाहरी व्यक्ति और रिश्तेदार जल्दी आना नहीं चाहते, वजह सिर्फ असंख्य मक्खियों की भिनभिनाहट। सावित्री बाई ने बताया की इन मख्खियों के कारण सामाजिक अपमान भी झेलना पड़ता है। इधर पास के ग्राम बिलाड़ी का हरिश्चंद्र निषाद कहता है खाना, पानी अब मक्खियों के साथ होता है । खाने के बर्तन से लेकर परोसी गई थाली में सैकड़ों मक्खियों बैठती हैं जिन्हें भगाना मुश्किल होता है। कइयों बार खाने के निवाले के साथ मक्खियां आहार भी बन जाती हैं। यहां की तस्वीर और हालात देखकर मुझे वो पुराना जुमला याद आया जिसमें जिक्र है … ‘देखकर कोई मख्खी नहीं निगलता’ गाँव के लोग इस कहावत को झुठलाते हैं और जुमले को याद भी नहीं करना चाहते । गाँव के लोगों की बातों पर यकीन करें तो बारिश के मौसम में इन छोटी मखियों की भीड़ में हरे रंग की बड़ी मक्खियों का आना शुरू हो जाता है जो बेहद परेशानी का सबब बनती है।

कच्चा-पका खाना, मख्खियों से यूँ ही अटा रहता है

तिल्दा से लगे इन गाँव में कोई घर मक्खियों के प्रकोप से अछूता नहीं । वजह पूछने पर गाँव के लोग पास के एक पोल्ट्री फ़ार्म का नाम बताते हैं । करीब 6 सौ एकड़ में फैला मुर्गियों का कारोबार भी हमने करीब से देखा । हालात बद से बदत्तर हैं । गाँव के लोगों मानते हैं 2003 से गाँव में मक्खियों ने प्रवेश किया जो समय के साथ असंख्य संख्या में हो गई । पोल्ट्री फ़ार्म का कचरा, मुर्गियों की बीट और दूसरे वेस्ट इन गांव के आस पास खुले में फेंक दिए गए है जिनकी वजह से जिंदगी नर्क हो गई। नर्क प्रदुषण से शायद कम था सो मख्खिओं ने ऐसा कहर बरपाया कि घर में कोई मेहमान जल्दी नहीं आते । गाँव के लोगों का आरोप है शासन प्रशासन इस भीषण समस्या को नज़रअंदाज कर रहा है।
ग्राम बिलाड़ी के बल्लू निषाद बताते हैं जब से ग्राम सिनोधा और बिलाड़ि की सरहद के बीच मुर्गियों का बड़ा कारोबार शुरू हुआ गाँव की तस्वीर बदल गई। बाहरी तत्वों ने गाँव की शांति भंग की वहीँ एक दशक में ऐसा कोई दिन नहीं गुजरा जब वायु प्रदुषण के जरिये साँसों के भीतर मरी हुई मुर्गियों और उनके अपशिष्ट का धुंआ ना भरा हो, जानकार बताते हैं अधिकांश लोग सांस की बिमारी से ग्रसित हैं। इस ओर पर्यावरण विभाग जानबूझकर देखना नहीं चाहता, गाँव के लोगों का आरोप है की मुर्गियों के कारोबार के नाम पर बीमारियां परोसने वालों के साथ गाँव के सरपंच-पंच तक मिले हुए हैं। मुर्गी फ़ार्म से निकले अपशिष्ट के साथ बड़ी मात्रा में पन्नियाँ भी सड़क किनारे फेंक दी जाती हैं जो इंसान के साथ-साथ मवेशियों को भी मौत के मुंह में धक्का मार रहीं हैं। यहां स्वच्छ भारत का सपना दिखाने वाले दूर-दूर तक दिखाई नहीं पड़ते।

मुर्गी फ़ार्म से निकले अपशिष्ट

मुर्गियों के प्रदुषण और मक्खियों के प्रकोप से जिंदगी को नर्क बना चुके लोगों ने लड़कियों की तस्करी जैसे गंभीर आरोप भी लगाए हैं। ग्राम बिलाड़ी के हरिश्चंद्र निषाद कहते हैं कृषि कार्य के लिए ली गई सैकड़ों एकड़ जमीन पर 14 बरस पहले मुर्गी फ़ार्म का काम आंध्रा के रमेश नायडू पिता शंकर राव नायडू ने शुरू किया। फार्म में काम करने वाले 99 फीसदी कर्मचारी आंध्रा के है। धीरे-धीरे पास लगे गाँव बिलाड़ी,सिनोधा और केसदा में रहने वाली लड़कियों को काम पर रखा गया। पोल्ट्री फ़ार्म के मेनुवल का गाँव के लोगों को ज्यादा पता नहीं लेकिन उनका दावा है की पिछले एक दशक में सिर्फ कुवारी लड़कियों को काम पर रखा गया। शादी-शुदा महिला और गाँव के पुरुष इस फ़ार्म में नौकरी के हकदार नहीं होते। हरिश्चंद्र बताते हैं की कुवारी लड़कियों को काम के दौरान वहां रहने वाले बाहरी पुरुष प्रेम जाल में फांसकर आंध्रा ले जाते हैं फिर वो लड़किया लौटकर गाँव नहीं आती। उन्होंने बताया ग्राम केसदा के कुछ लोगों ने कई बार पोल्ट्री फ़ार्म में घुसकर मारपीट भी की लेकिन प्रशासनिक अमला बड़े कारोबारी के पाले में खड़ा रहा। हर साल आस-पास के गाँवों से 15 से 18 लड़कियों के आंध्रा ले जाए जाने की बात दावे से कही जा रही है। हालांकि इस मामले में वहां काम करने वाली लडकियां कुछ भी कहने से बचती हैं।

पोल्ट्री फ़ार्म में काम करने वाली लडकियां

ग्राम बिलाड़ी और सिनोधा की सरहद के बीच स्थित वेंकटरामा पोल्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड के रमेश नायडू पिता शंकर राव नायडू पर आदिवासी की जमीन हथियाने का आरोप भी है। मामला राजस्व निरीक्षक तिल्दा के समक्ष है। प्राप्त दस्तावेज के मुताबिक़ ग्राम बिलाड़ि में जिस जगह पर वेंकटरामा पोल्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड का कारोबार मुख्य सड़क के दोनों ओर फैला हैं वहां करीब एक एकड़ एक सौ तिहत्तर हेक्टेयर जमीन असित राम पिता रामचंद्र गोंड की है जिसे वहां से बेदखल करने की तमाम कोशिशे हुईं चूँकि एक झोपडी में जिंदगी बसर कर रहा गोंड आदिवासी परिवार अपनी जमीन किसी भी हाल में नहीं छोड़ना चाहता जबकि पटवारी, राजस्व निरीक्षक और तहसीलदार उन्हें कहीं और जमीन देने का हवाला देकर उस जमीन को खाली करवाने का प्रयास कर रहे हैं जो वेंकटरामा पोल्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड के कारोबार में फांस की तरह फसी हुई हैं।
ये तमाम कठिनाइयां, जिंदगी से होते खिलवाड़ और नर्क भोगते लोगों की हकीकत राजधानी रायपुर से महज 70 किलोमीटर दूर है फिर भी रहबर खामोश है, रहनुमाई करने वाले गंभीर आरोपों से घिरे हैं। गाँव के लोग एक दशक से इस सवाल का जवाब खोज रहे आखिर कहें किससे ? कौन है जो नर्क से बदत्तर जिंदगी को शुद्ध हवा-पानी दिलाएगा ? कौन है जिस पर यकीं किया जाये, ये कइयों सवाल अब भी सवाल ही है।

सत्यप्रकाश पान्डेय फ़ोटो जर्नलिस्ट

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Posted by on Apr 29 2017. Filed under छत्तीसगढ, स्वास्थ्य. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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