बंधुआ मजदूरों की कौन हरेगा पीर

बिकास कुमार शर्मा 

जांजगीर-चांपा/रायगढ़/रायपुर – सुरेश कुमार और उसका 10 सदस्यों वाला परिवार पिछले साढ़े तीन महीनों से चावल और चटनी खाकर गुजारा कर रहा है। जांजगीर-चांपा जिले के तुषार गांव के रहनेवाले 30 वर्षीय कुमार की इतनी हैसियत नहीं है कि वह सब्जी खरीद सके या अपने फूस के घर की मरम्मत करा सके, जिसमें पिछले सप्ताह से हो रही हलकी बारिश ने सीलन पैदा कर दी है। 
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वह उन 75 लोगों में से एक है, जिन्हें इसी साल 15 फरवरी को पंजाब के कापूरथला जिले के एक ईंट भट्ठे से मुक्त कराया गया था। इसमें ज्यादातर हरिजन (दलित) समुदाय से हैं। भट्ठे के मालिक ने उन्हें पांच वर्षों से बंधुआ मजदूर बना रखा था। उनसे 300-400 रुपए साप्ताहिक की मामूली मजदूरी पर रोजाना 15-19 घण्टे काम कराया जाता था। सुरेश अपनी व्यथा बताता है, “ईंट-भट्ठा मालिक ने 20-30 गार्डों को हम पर कड़ी नजर रखने के लिए रखा हुआ था। जब भी कोई मजदूर नौकरी छोड़कर जाने की बात कहता, गार्ड उसे गालियां देते और गुलामों जैसा बर्ताव करते।”  

इस साल अपने पुरखों की जमीन पर लौटने के बाद सुरेश और उनके जैसे मुक्त कराए गए अन्य मजदूरों ने यहां फिर से नई जिंदगी शुरू करने की सोची, मगर पैसे और संसाधनों के अभाव के कारण वे ऐसा नहीं कर सके। अभी तक इन मजदूरों को सरकारी वादे के मुताबिक मिलने वाले 50 हजार रुपए (जिसमें 40 हजार रु राज्य सरकार और 10 हजार केंद्र सरकार की ओर से मिलने थे) नहीं मिले हैं। 

“मैं अब तक तीन बार जिला कलेक्टर के ऑफिस का चक्कर लगा चुका हूं, स्थानीय तहसील कार्यालय तो इन दिनों हफ्ते में दो बार जा रहा हूं लेकिन अफसरों ने आश्वासन के सिवाय कुछ नहीं दिया,” कुमार ने अपने फूस के उस घर की ओर उंगली से इशारा करते हुए कहा जिसमें बारिश शुरू होते ही पानी रिसने लगता है।

31 वर्षीय सुरेश अपनी पत्नी, मां, दो भाइयों, और एक भाई की पत्नी के साथ किसी तरह एक छोटी सी झोपड़ी में रह रहा है। वह कहता है, “काम करने के लिए हजारों किलोमीटर दूर जाने के पीछे एक बड़ी सोच यह भी थी कि कि हमारी झोपड़ी कंक्रीट में तब्दील हो सके। लेकिन आज मैं कहीं का नहीं रहा।”

रायगढ़ के जिला श्रम पदाधिकारी यूके कच्छप मानते हैं कि मुक्त कराए गए मजदूरों के भुगतान में देरी हुई है। उनका कहना है कि ये देरी आम चुनावों के कारण हो गई लेकिन अब अगले दो हफ्तों में मजदूरों को 40 हजार रुपए का भुगतान सुनिश्चित कर दिया जाएगा।

रायगढ़ जिला मुख्यालय से करीब 72 किलोमीटर दूर स्थित एक छोटे से गांव सिंहनपुर में रहने वाले अधेड़े उम्र के कौशल प्रसाद की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। कौशल अपनी पत्नी उमा देवी के साथ उसी भट्ठे में बंधुआ मजदूर की तरह काम कर रहा था। रायगढ़ जिला प्रशासन से राज्य सरकार के दो कर्मचारी भी उस रेस्क्यू टीम के साथ थे, जो सभी मजदूरों को मुक्त कराकर उनके घर तक ले आई।

जब मैं कौशल के अस्थायी घर में पहुंचा तो उसने मुझे अपना और अपनी पत्नी के मुक्ति प्रमाणपत्र, वो जरूरी दस्तावेज जो बंधुआ मजदूरों को पुनर्वास  लाभ देती है, दिखाया। वह कहता है, “देखिए, सौ से ज्यादा दिन हो गए, सरकार की ओर से हमें फूटी कौड़ी भी नहीं मिली। हमारी तकलीफ बढ़ती ही जा रही है। सोचा था पुनर्वास के पैसे से अपना घर ठीक कर लूंगा, लेकिन इस बरसात के मौसम में भी मैं इस छोटी से झोपड़ी में रह रहा हूं, जहां जानवर भी नहीं रहेंगे।” कौशल और मुक्त कराए गए गांव के अन्य मजदूरों के पास कोई नौकरी नहीं है, जिस कारण रोजाना की जरूरतें पूरा कर पाना भी उनके लिए काफी मुश्किल काम है। सिंहनपुर में कुल 46 मजदूर हैं। गांव के उप सरपंच ने बताया कि उन्होंने जॉब कार्ड बनाने के लिए पीड़ितों के नाम भेजे हैं, लेकिन इसमें कुछ वक्त लगेगा। 
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लुंगी (भारतीय गांवों में पहनी जाने वाली पारंपरिक पोशाक) पहने कौशल आगे बताता है कि उसके और उसकी पत्नी उमा देवी के लिए वह कितना मुश्किल वक्त था जो उन्होंने ईंट भट्ठों में बिताया। वहां उन्हें बंदी बनाकर रखा गया था। उसकी पत्नी उन सुपरवाइजरों के जुल्म की एक अलग ही कहानी बयां करती है जिन्हें ईंट भट्ठे के मालिक ने मजदूरों पर कड़ी नजर रखने के लिए तैनात कर रखा था। वह बताती है कि वे मजदूरों के दुर्वव्यहार तो करते ही थे, महिला मजदूरों को गालियां भी देते थे।

“जब हम नहाने जाते थे तो वे बाथरूम के दरवाजे के छेद से हमें झांका करते थे,” उमा ने हिचकिचाते हुए कहा। उसने यह भी बताया कि भट्ठों में बच्चे भी काम किया करते थे। देवी को भी उम्मीद थी कि पुनर्वास पैकेज से शायद उसकी जिंदगी भी कुछ हद तक सुधर जाती अगर वह समय से मिल जाता। अब भी पुनर्वास राशि पाने की उम्मीद लिए कौशल कहता है, “मैं अपना गांव नहीं छोड़ूंगा चाहे मुझे कोई नौकरी मिले न मिले।”

पुनर्वास के अभाव ने दुलेश्वर के साथ भी क्रूर खेल खेला है। वह जबसे सिंहनपुर लौटा है, छह सदस्यों वाले परिवार के साथ अपने एक दोस्त के के घर शरण लेने को मजबूर है। उसके पास एक झोपड़ी थी जो मरम्मत के अभाव में ढह गई। अपना दर्ज बयां करते हुए वह कहता है, “मैं आश्वस्त था कि मेरे पास एक घर है और उसे ढहते देख मुझे बहुत दुख हुआ था।” उसने कहा कि न उसके पास रोजगार है न घर, जिस वजह से उसकी जिंदगी बरबाद हो रही है।

हाल के पांच सालों में बंधुआ मजदूरी देश में एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरी है, खासकर छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के 2013 के आंकड़ों के अनुसार राज्य में करीब 1.17 करोड़ लोग बेगारी में फंसे हुए हैं। भारत सरकार के श्रम मंत्रालय के अनुसार बंधुआ मजदूरी (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 पारित होने के बाद इन 37 सालों में करीब तीन लाख बंधुआ मजदूरों का पुनर्वास किया गया है। राज्य के श्रम विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, कुल 2368 मजदूर पिछले 13 सालों में मुक्त किए गए हैं। इस आंकड़े में 1273 वे मजदूर भी शामिल हैं, जिनको 2010-14 के बीच मुक्त कराकर पुनर्वासित किया गया है। राज्य श्रम आयुक्त जीतेंद्र कुमार इन आंकड़ों को विभाग की सक्रियता के नमूने के तौर पर देखते हैं, लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि सरकारी मशीनरी वापस लाए गए मजदूरों के उचित पुनर्वास में असफल रही है।

बंधुआ मजदूरों की मुक्ति के लिए पिछले तीन दशकों से काम कर रहे नई दिल्ली स्थित गैरसरकारी संस्था (एनजीओ) बॉन्डेड लेबर लिब्रेशन फ्रंट (बीएलएलएफ) के कार्यकारी निदेशक निर्मल गोराना सवाल उठाते हैं, “छत्तीसगढ़ सरकार जिन आंकड़ों की बात कर रही है, वह उन बंधुआ मजदूरों की संख्या पर आधारित है जो रिलीज सर्टिफिकेट प्राप्त करने के बाद सरकारी सुविधाएं प्राप्त करने में सफल रहे हैं। लेकिन उनका क्या जिन्हें उन प्रदेशों के जिला प्रशासन ने रिलीज सर्टिफिकेट नहीं दिया, जहां वे काम कर रहे थे?”

गोराना जहां छत्तीसगढ़ से मजदूरों के पलायन के लिए काम के अवसरों की कमी को प्राथमिक कारण के रूप में जिम्मेदार ठहराते हैं, वहीं श्रमायुक्त कुमार कहते हैं, “मुझे इसमें कोई खास बात नहीं नजर आती। सोचिए, जब बिहार, झारखंड और उड़ीसा से लोग यहां के कारखानों में काम करने आ रहे हैं, तो कैसे कह सकते हैं कि छत्तीसगढ़ में अपने ही लोगों को रोजगार नहीं मिल रहा है।”

बीएलएलएफ आगे दावा करती है कि उसने पिछले चार सालों में छत्तीसगढ़ के रहनेवाले 2000 मजदूरों को मुक्त कराया है लेकिन उनमें से ज्यादातर को सोर्स क्षेत्र के प्रशासन से रिलीज सर्टिफिकेट नहीं दिया गया है। श्रमायुक्त ने आगे बताया कि विभाग ने उत्तरप्रदेश, बिहार और झारखंड के साथ एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) पर हस्ताक्षर किया है जिसके अनुसार वे साथ मिलकर बंधुआ मजदूरी को उन्मूलन के लिए काम करेंगे। जम्मू-कश्मीर और पंजाब सरकार को पत्र भी भेजे गए हैं, हालांकि दोनों में से किसी का जवाब नहीं आया है।  
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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर में प्रैक्टिस कर रही वरिष्ठ अधिवक्ता सुधा भारद्वाज राज्य सरकार के बड़े-बड़े दावों का खंडन करती हैं। पलायन का एक और कारण गिनाते हुए वह कहती हैं, “ज्यादातर गरीब लोग महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) या अन्य योजनाओं के अंतर्गत काम के बदले समय पर मजदूरी नहीं पाते। बाद में उन दलालों के चक्कर में फंस जाते हैं जो उन्हें बाहर बेहतर काम दिलाने का लालच देते हैं। सरकार मजदूरों को समय पर मजदूरी का भुगतान क्यों नहीं करती? ” उन्होंने यह भी बताया कि ज्यादातर समय उक्त स्थान, जहाँ मजदूर काम करते हैं, के प्रशासन और भट्ठा मालिकों की सांठ-गाँठ के कारण भी मजदूरों को बुरी स्थति से दो-चार होना पड़ता है। “मजदूर लौटने के बाद यह भी बताते हैं कि जब भी वहां के अधिकारी रेड करते हैं तो मालिक भाग जाते हैं जिसके कारण उन्हें बंधक नहीं माना जाता। इस तरह ज्यादातर मजदूरों को मुक्ति प्रमाणपत्र नहीं मिल पाता है।”


(इंटरनेशनल सेंटर फॉर जर्नलिस्ट, युएसए के मल्टीमीडिया प्रशिक्षण 2014 के तहत लिखी गई स्टोरी)

लेखक युवा पत्रकार हैं एवं वर्त्तमान में रायपुर शहर के एक अंग्रेजी अख़बार में कार्यरत हैं

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