गौ हत्या: विरोध का तालिबानी रुप

लोकतंत्र सरकार का विरोध करने की छूट देता है कूनीतियों एवं गलत फैसलों पर। एक तरह से अंकुश का काम करता है सरकार रुपी गज को निय॔त्रित करने के लिए और यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।
परन्तु इस खूबसूरती का कुरूप चेहरा वर्तमान में दिखाई दे रहा है। विरोध का स्तर इस नीचताई तक पहुँच गया है कि गौवंश को भी काटकर एवं पकाकर सार्वजनिक प्रदर्शन किया गया।
लो तुम गौरक्षा के पैरोकार हो तो हम गौहत्या और भक्षणकर विरोध करते हैं, जो उखाड़ना है उखाड़ लो, चौड़े में चैलेंज। कहां तक गिरोगे तुम लोग? विरोध करने के लिए एक निरीह पशु की हत्या कर दी।
इस घटना से कांग्रेस का वामपंथी गठजोड़ एवं चाल चरित्र चेहरा सामने आ गया और वह बदलाव भी। किसी जमाने में हिन्दूओं को प्रभावित करने के लिए कांग्रेस का चुनाव चिन्ह ही गाय बछड़ा था। कई चुनाव इस चिन्ह पर लड़े गये। सोच छोटी हुई और सेकुलर चुनाव चिन्ह का इस्तेमाल किया गया।
कल की घटना एक तरह से गौ गंगा को माँ का दर्जा देने वाले बहुसंख्यक समाज को खिजाने एवं उकसाने का षड्यंत्र है। जब भी भारत में गौरक्षा कानून की मांग उठती है तो कांग्रेस का हिन्दू विरोधी चेहरा किसी न किसी रूप में सामने आ जाता है JNU, काश्मीर बंगाल के बाद अब केरल में बीफ पार्टी शुरु हो जाती है।
लोग सिर्फ मोदी विरोध एवं सत्ता की भूख में इतने अंधे हो चुके हैं कि अपने इतिहास को भी भुला बैठे हैं। उन्हें मालूम होना चाहिए कि 1857 का स्वतंत्रता आंदोलन ही गौहत्या के विरोध स्वरुप प्रारंभ हुआ था और हजारोंने विद्रोह कर अपने प्राणों की आहूति दी थी।
विदेशी आकाइन की चरण चम्पी कर मलाई खाने की तमन्ना रखने वालों का विवेक इस हद तक सुन्न हो चुका है कि मोदी विरोध करते करते ये राष्ट्र विरोध पर उतर आते हैं और हिन्दूओं की आस्था और अस्मिता पर सीधी चोट करने लगते हैं। कल का गौहत्या का दुष्कर्म कांग्रेस को बहुत भारी पड़ने वाला है।
सत्ता पाने का लालच षड्यंत्रपूर्वक बहुसंख्यक हिन्दूओं को बांटने का दुष्चक्र भी चला रहा है। जिससे हिन्दू समाज कमजोरकर और दलितों को अलगकर मुसलमानों को साधकर सत्ता तक किसी तरह सत्ता सुंदरी का वरण कर सके। जय भीम और जय मीम का नारा लगाकर गठजोड़ का भ्रम फैलाकर वोट खींच सकें।
पर कल जो वीडियो सामने आया जिसमें दो दलित लड़कियों के साथ खुले आम दुष्कर्म करने की कोशिश हुई और इसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर शेयर किया गया यह दुस्साहस की पराकाष्ठा है। इससे जाहिर होता है कि बंटने के बाद हिन्दू समाज कितना असुरक्षित है।
यही स्थिति रही तो अभी इस राजनीति का विकृत रुप एवं घिघौना चेहरा सामने आना बाकी है। जिसकी शुरुआत सहारनपुर से हो चुकी है। जहाँ हिन्दूओं को आपस में लड़ाकर हासिए पर जाती राजनीति को चमकाने की घृणित कोशिश की गयी। हिन्दू को हिन्दू से लड़ाया जा रहा है और उन्हें बांटकर उनकी चिताओं की आग में अपनी राजनीतिक रोटियां सेकी जा रही है। आखिर इस षड्यंत्र को कब समझेंगे लोग?

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