गाँव का वातावरण स्वाथ्यवर्धक क्यों होता है जानिए।

मिट्टी की दीवारों और खपरैल का बना गाँव का घर, तीनो भीषण मौसमों में सुखदायक होता है, ऐसा सुख कांक्रीट के बड़े भवनों में कहाँ? दो या तीन मुख्य कमरों के साथ सामने की परछी निवास के लिए उपयोग में लाई जाती है, मुख्य कमरों के ऊपर का पटाव धान इत्यादि उपज रखने के काम आता है, बगल की छोटी परछी बरसात के लिए ऊपले और इंधन जमा करने के काम आती है। पीछे की परछी में रसोई और कुंए, बखरी की तरफ़ जाने के लिए रास्ता। बाजार के साग में दवाईयों की मात्रा अधिक होती है और खुद की बखरी का साग निरोग होता है। बखरी में थोड़ी सी मेहनत के बाद सुबह शाम का साग उपलब्ध हो जाता है।


बांई परछी में गाय, गोरु एवं छेरी-बकरी के साथ उनका भोजन (धान का पैरा) रखा जाता है। इस तरह एक छोटा सा घर ही सभी के लिए उपयोगी सिद्ध हो जाता है। चूल्हे में पके हुए भोजन का कहना ही क्या है, भले ही गैर सब्सिडी की गैस का उपयोग भोजन बनाने में कर लो, पर वह लकड़ी के कोयलों और ऊपलों की सौंधी खुश्बू उसमें नहीं आ पाती, यह प्राणहीन भोजन चया-पचय को खराब कर वायूरोग के साथ विभिन्न व्याधियों का जन्म दे रहा है, जिसका भरपूर लाभ दवाई कम्पनियां उठा रही है, लाभ के साथ धीरे धीरे मरीज को भी उठा रही हैं।

शहर में आदमी के लिए रहने की जगह नहीं है, एक मेहमान अगर आ जाए तो मालकिन परदे के पीछे से नाक भौं सिकोड़ने लगती है, लोग बजट बनाकर खर्च करने लगे हैं। ऐसे में गाय गोरु रखने की जगह कहाँ से मिलेगी। अगर कोई भक्ति भाव में गाय खरीद भी लेता है तो दूह कर सड़क पर मरने-मारने छोड़ देता है, सुबह शाम दूध निकालने के समय बस हाँक लाता है। गाँव में मैने कभी नहीं देखा कि कोई बजट बनाता होगा। आज खुद कल खुदा वाली फ़क्कड़ी यहाँ दिखाई देता है, अगर किसी के यहाँ पहुंच भी गए तो एक टाईम का उत्तम भोजन वह कराने का प्रयास करता है और अनजान व्यक्ति का अतिथि सत्कार दिल से करता है।

मैं जब भी जंगल की यात्रा पर जाता हूं तो आस-पास के गांव में किसी के भी घर में भोजन बनवाता हूँ, वे भी बड़े मनोयोग से इस कार्य के लिए तत्पर हो जाते हैं, अगर आवश्यक हुआ तो मनपसंद साग-भाजी के लिए कुछ रुपए देकर काम पर निकल जाता हूँ और लौटने पर गर्म भोजन तैयार मिलता है, स्नेह के साथ कराए हुए भोजन का स्वाद और बढ जाता है और आत्मा भी तृप्त हो जाती है।


सोते समय खपरैल की छत से भले ही किसी सांप के लटकने की आशंका बनी रहे, पर नींद भी सूकून की आती है। कैरियर को स्थापित करने वाली शहरों की भाग दौड़ भरी जिन्दगी में इन मनुहारों की आशा भी नहीं की जा सकती। गांवों में भी धीरे-धीरे शहरी सभ्यता प्रवेश कर चुकी है, लगता है कुछ वर्षों में ये भी बदलने लगेगें, इस विकास की कीमत हमको ही नहीं, सबको चुकानी पड़ेगी। परन्तु आज भी ये घर, चूल्हा, बखरी, गाय, बैल, पोसवा कुकूर और मेरी जावा मोटर सायकिल सपने में आ ही जाते हैं।

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Posted by on Feb 5 2018. Filed under futured, कला-संस्कृति. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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