कहाँ हैं कलियाँ ,फूल कहाँ हैं ?

माटी के कण-कण में क्रंदन,  चन्दन जैसी धूल कहाँ है ,
मायूसी के इस मौसम में कहाँ हैं कलियाँ ,फूल कहाँ हैं ?

कहाँ हैं खुशबू, कहाँ हैं खुशियाँ , कहाँ नया संगीत है बोलो ,
विश्वास न हो तो इतिहास को देखो ,वर्तमान के पन्ने खोलो !

वही वचन है , वही  भजन है , आवाज़ वही है भाषण की ,
वही रुदन है , वही चीख है, वही सीख है अनुशासन की !

भीख मांगते इंसानों की  मीलों  लम्बी कतार वही है ,
बरसों के इस अंधियारे में सुबह का इंतज़ार वही है !

कुछ चेहरों पर चर्बी चढ़ गयी और अनगिनत चेहरे सूखे ,
कुछ लोगों की भरपूर रसोई  और अनगिनत लोग है भूखे !

सड़कों पर यहाँ बिखरा-बिखरा इंसानों का रक्त वही है ,
केवल करवट बदली इसने ,यह पुराना वक्त वही है !

नए साल का यह दिखावा , फिर भी तो हर साल आता है ,
चूल्हे की बुझी-बुझी राख पर चुटकी भर उबाल आता है !

स्वराज्य करुण

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Posted by on Jan 9 2011. Filed under कविताएँ. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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