इतिहास के झरोखे से: चुन्नी खैरवार उर्फ़ भारत सरकार

कहानी आजादी के बाद की है, सरगुजा के खोभी चलगली में चुन्नी खैरवार नामक आदिवासी रहता था। जो कटुभाषी होने के साथ ऊलजलूल हरकतें करता था। उसने स्थानीय लोगों की अशिक्षा का फ़ायदा उठा एक संगठन तैयार कर स्वयं को भारत सरकार घोषित कर दिया तथा स्थानीय सरकार बन बैठा। इसकी हरकतों से परेशान सरकार द्वारा उसका संगठन तोड़ने के लिए बंदूक के बल का सहारा लेना पड़ा।
चुन्नी कम पढ़ा लिखा था, 1951 में वह माता राजमोहनी के संगठन में किसी तरह सम्मिलित हो गया। संगठन में वह हमेशा व्यर्थ का विवाद कर अपनी बात मनवाने का प्रयास करता था। उस समय माता राजमोहनी का क्षेत्र में सम्मान था। उसके भी मन में इसी तरह का कोई संगठन बना कर जनता से खुद को पुजवाने की महत्वाकांक्षा जागृत हो गई। उसने चुन्नी से अपना नाम बदल कर जगमोहन नाम धारण कर लिया और कहने लगा कि उस पर भारत माता की छाया आती है।
जगमोहन की भ्रामक बातें लोगों को आकर्षित करने लगी। कुछ लोग उसकी बातों को सराहने भी लगे। वह लोगों से कहने लगा कि उसे भारत माता कहा जाए तथा स्वयं को भारत माता कहने के लिए वह लोगों को बाध्य करने लगा। उसकी इस बाध्यता से परेशान होकर गाँव वालों ने उसकी पिटाई कर दी और इस आशय की रिपोर्ट थाने में भी कर दी। कुछ समय उपरांत लोग थक हार कर उसे भारत माता कहने लगे।
कुछ समय पश्चात सरगुजा जनपद सभा का चुनाव आया तो वह चुनाव में कौंसिलर पद के लिए निर्विरोध निर्वाचित हो गया। जनपद सभा के अध्यक्ष राजा अम्बिकेश्वरशरण सिंहदेव बने। जनपद सभा की बैठकें होने लगी। जगमोहन प्रति माह बैठक में सम्मिलित होता था। कार्यवाही एवं प्रस्ताव के सम्बंध में राजा साहब उसकी राय लेते और बैठक के उपरांत उसके घर जाने के लिए कुछ पैसे भी अपनी जेब से दे देते थे।
पद एवं सम्मान पाकर जगमोहन के मन में अहंकार घर कर गया। वह सोचने लगा था कि राजा को अब उससे पूछ कर कार्य करना पड़ता है। इसी दौरान एक घटना घट गई, भारत सरकार द्वारा एक पर्चा जारी हुआ जिसमें जमींदारी प्रथा उन्मुलन के विषय में लिखा था। यह पर्चा जगमोहन के हाथ लग गया। उसने पर्चा पढ कर मान लिया कि जमींदारी प्रथा समाप्त हो गई। गाँव आकर उसने एलान कर दिया कि मालगुजारी देना बंद कर दो। मैं भारत सरकार बन गया हूँ। गाँव के अनपढ़ भोले-भाले लोगों ने पर्चा देखकर जगमोहन की बात मान ली और मालगुजारी देना बंद कर दिया।
जगमोहन से मिली छूट पाकर लोगों ने अंधाधुंध जंगल काटना शुरु कर दिया। जिससे जनता में हड़कम्प मच गया। सरकार ने रामानुजगंज से मालगुजारी लेना प्रारंभ किया तो लोग लगान देने के लिए तैयार नहीं हुए। सरकार कुर्की नीलामी की कार्यवाही करने लगी। इसके बाद भी चुन्नी सरकार उर्फ़ भारत सरकार के संगठन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। चुन्नी ने एलान कर दिया कि सरगुजा सरकार को कोई नहीं माने, वह ही भारत सरकार है, उसकी बातों को सभी माने। वह जो कहेगा वही होगा।
उसके बाद जगमोहन दिल्ली का कानून लाने की बात कह कर अपने कुछ साथियों के साथ दिल्ली चला गया। वहाँ एक रेड़ियो, एक टाईपराईटर और कुछ कागज खरीद कर गांव लौट आया। रेड़ियो में जो भी प्रसारित होता, उसे टाईप करवाता और उसे ही अपना कानून बता कर फ़रमान जारी करता। इस नौटंकी के उसके मानने वाले प्रशंसकों की संख्या बढते गई। इस माहौल ने सरकार से टकराव की स्थिति पैदा करदी। अराजकता फ़ैलने लगी तब सरकार ने जगमोहन के विरुद्ध कई अपराध दर्ज कर उसकी गिरफ़्तारी के आदेश जारी कर दिए।
गिरफ़्तारी से बचने के लिए जगमोहन अपने परिवार के साथ जंगल में रहने लगा। सरकार ने परेशान होकर उसकी घेराबंदी की। कई दिनों तक उसकी तरफ़ से पुलिस पर पथराव तथा आक्रमण होता रहा। इस आक्रमण से निपटने के लिए पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। बंदूक चलने पर दो लोगों की मृत्यू हो गई और किसी तरह जगमोहन को गिरफ़्तार कर न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। मुकदमे लड़ते-लड़ते एक दिन चुन्नी उर्फ़ जगमोहन सरकार इस दुनिया से चल बसा और अशिक्षा से उपजे एक नाटक पटाक्षेप हो गया।

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त्रिपुरारी पाण्डेय लखनपुर

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Posted by on Sep 25 2014. Filed under सम्पादकीय. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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