अकल-कर्मी और सकल-कर्मी ! स्वराज्य करुण

देश में इन दिनों दो तरह के कर्मी साफ़ नज़र आ रहे हैं – अकल कर्मी और सकल कर्मी . वैसे शिक्षा -कर्मी और पंचायत कर्मी भी यहाँ पाए जाते हैं , लेकिन आबादी में  अकल कर्मियों और सकल कर्मियों की  संख्या ज्यादा है.  अकल-कर्मी केवल अकल से काम लेता है और लोगों से काम निकलवा भी लेता है . वह समुद्र न सही अपनी बस्ती में अवैध कब्जे की भेंट चढ़ रहे तालाब की लहरें गिन कर भी कमाई कर लेने की अकल रखता है . दूसरी तरफ ‘सकल कर्मी है , जो काला बाजारी ,मुनाफाखोरी और रिश्वतखोरी समेत हर तरह के काम आसानी से  करता रहता  है , लेकिन ऐसा कोई भी काम वह अकल-कर्मी से अकल उधार लेकर ही करता है, भले ही  उधार चुकता कर पाए या न भी कर पाए.  सकल-कर्मी तो बाबा तुलसीदास की इन पंक्तियों को अपना आदर्श मान कर चलता है-
सकल पदारथ है जग माही
करमहीन नर पावत नाही !

इसलिए सकल पदारथ पाने के लिए ही सकल-कर्मियों की जमात अकल-कर्मियों को साध कर चलती है. अकल-कर्मी उन्हें नोटिंग से लेकर वोटिंग तक हर जगह ‘अकल-दान ‘करते रहते हैं और उन्हीं के सहयोग से सकल-कर्मी सकल करम करने से नहीं घबराते. साल में दो-तीन बार सकल-कर्मी और अकल-कर्मी  एक साथ पर्यटन के लिए भी निकल पड़ते हैं.  सकल-कर्मियों   और अकल-कर्मियों के रिश्ते ग्राहक और दुकानदार जैसे होते तो हैं,लेकिन दोनों एक दूसरे के पूरक होने के कारण इस रिश्ते में खटास नहीं होती .हमेशा मिठास बनी रहती है क्योंकि लक्ष्य दोनों का एक ही होता है .सच तो यह है कि दुकानदार और ग्राहक के बीच अच्छे संबंध हों  तो कारोबार में  कोई रुकावट नहीं आती. इसलिए तीर्थ यात्राएं भी बिना किसी रुकावट के, चलती रहती हैं. रिश्ता   बिगड जाने पर एक बार एक अकल-कर्मी ने एक सकल-कर्मी  के घर छापे डलवा दिए . बिस्तर  के नीचे से , बाथरूम की दीवारों से , बैंक-खातों से , न जाने कहाँ -कहाँ से कम  से कम ढाई सौ करोड रूपए नगद निकले. .छापा डालने वालों को नोट गिनने की मशीन मंगवानी पड़ी. बेचारा सकल कर्मी बहुत परेशान हुआ . अकल-कर्मी से रिश्ता अच्छा बनाने के लिए पंडित जी की सलाह पर उसने ‘रिश्वत-यज्ञ ‘ किया. दोनों की दोस्ती फिर बहाल  हो गयी . तब से लेकर अब तक यह दोस्ती बदस्तूर कायम है. अब सारे अकल-कर्मी और सकल-कर्मी एक साथ ,एक ही थाली में खाते हैं . देश के अनेक नामी-गिरामी अकल-कर्मी और सकल-कर्मी आज-कल   ‘तिहाड़ ‘   की तीर्थ-यात्रा पर हैं.
साथियों ! कोयले की दलाली और  ज़मीन-दलाली समेत सकल करम करने के बाद जब करने के लिए और कुछ बाकी नहीं रह जाता  तो सारे सकल-कर्मी अपने-अपने साथी अकल-कर्मियों को साथ लेकर तीर्थ -यात्रा पर निकल पड़ते हैं . स्विस-बैंकों की गंगोत्री से इंटरनेट की सूक्ष्म तरंगों के ज़रिये प्रवाहित  गुप्त-गंगा के किनारे इन दिनों तीर्थ यात्रियों के रूप में सकल-कर्मी और अकल -कर्मी ,  दोनों ही तरह के कर्मियों की भारी भीड़ है. दोनों इस बहती गंगा में जमकर हाथ धो रहे हैं.  .  अकल-कर्मी और सकल -कर्मी के बीच एक अघोषित समझौता है . उनकी स्विस-बैंक वाली तीर्थ-यात्रा में विघ्न-संतोषी किसी प्रकार का विघ्न मत डाले, इसके लिए दोनों हमेशा सचेत रहते हैं. कबीरदास जी ने करीब छह सौ साल पहले एक दोहा इन पुण्यात्माओं को सादर समर्पित किया था  –
तीरथ चले दोई जन, चित चंचल मन चोर ,
एकौ पाप ना उतरया , दस मन लाए और !

भावार्थ यह कि चंचल मन के साथ तीर्थ यात्रा पर गए थे अपना पाप धोने ,पर एक भी पाप नहीं उतरा ,बल्कि दस मन पाप और भी लादकर लौट आए . इसे पढकर तो लगता है कि जो छह सौ साल पहले होता था , वही आज भी हो रहा है. चंचल और चोर ह्रदय के साथ तीर्थ यात्रा करने वालों का ही आज हर जगह बहुमत है. इस दोहे से यह भी मालूम होता है कि हर तीर्थ यात्री में कम से कम दस मन पाप का बोझ खुद पर लादकर चलने की ताकत होनी चाहिए . ज्यादा से ज्यादा आप चाहे  जितना लाद सकें,यह आपकी हैसियत और हौसले पर निर्भर है. तीर्थ यात्रा के लिए यह भी ज़रूरी है कि यात्री का चित्त चंचल हो, यानी वह सरकारी ,गैर-सरकारी , हर तरह के तौर-तरीकों के अनुसार इधर-उधर मुँह मारने की कला में दक्ष हो. यात्रा के आयोजक और प्रायोजक यानी अकल-कर्मी और सकल-कर्मी उसे हर जगह मिल जाएंगे .मिल क्या जाएंगे, आपसे मिलने वह खुद आपके पास दौड़े चले आएँगे.
—  स्वराज्य करुण

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